हिमाचल की लोककलाएं

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हिमाचल की लोककलाएं


भारत में सभी कलाओं का सम्बन्ध धर्म से जोड़ा मेया है । हिमाचल इसका अपवाद नहीं, यहां भी कला का नाता धार्मिक आस्थाओं तथा सांस्कृतिक परम्पराओं से है । यह यहां कं जीवन की अपेक्षाओं तथा वास्तविकताओं का प्रतिबिंब है । यहां की लोककला के कई रूप हैँ-मूतिंकलक्च, काष्ठकता, वास्तुकला (स्थापत्य), चित्रकला तथा विविध व्यावसायिक लोककलाएं । वास्तुकला तथा चित्रकला की स्वतन्त्र रूप से चर्चा इसी पुस्तक मेँ हो चुकी हे । अन्य रूपों की संक्षिप्त चर्चा यहां प्रस्तुत है ।


मूर्तिकला
हिमाचल प्रदेश मेँ मूर्तियों कं दो प्रमुख रूप ही रहे हैँ-पौराणिक (देवीन्देवता) तथा मानव मूर्तियां तया पशु मूर्तियां । देवीन्देवताओं में शिव, विष्णु, देवी की मूर्तियां प्रमुख हैँ-कहीं ये देव अकेले हैं, तो कहीँ अपनी पत्मियों दो साथ । अधिकांश मूर्तियों का आधार ब्राह्मणवादी आस्था हैं । पुजारी आराध्य देव की विशेषताओं और उसके स्वरूप का जेसा विवरण प्रस्तुत करते, मूर्तिकार उसे साकार करने का प्रयास करते । मानव मूर्तियों मेँ गंधर्व, गण, राजपुरुष, द्वारपाल, सेवक आदि ही प्रधान रहे हैँ । प्रदेश के मन्दिरों में पशु मूर्तियां अधिक नहीं । हाथी, वेल, शेर, पक्षियों, मछलियों, सांपों की मूर्तियां हैं पशु देव-वाहन जो हैं । मंडी के पंचवक्ता मन्दिर मेँ ऐसी मूर्तियां हैँ । मसरूर तथा हाटकोटी कं मन्दिरों में मछलियों को उकेरा गया है ।
प्रदेश में धातु, लक्खी तधा पाषाण प्रतिमाएं उपलब्ध है । इनकी शेती मुख्यत: परवर्ती गुप्तकालीन शेली से प्रभावित है, परन्तु राजपूत कला एवं स्थानीय परम्पराओं क्री रंगत इस शेती में है । जहां तक धातु मूर्तियों का सम्बन्ध हे, ये मूर्तियों कांस्य तथा अष्टधातु की हैं । उत्तरी भारत मेँ प्रतिहारों के शासनकाल (सन् 750 से 1930) में कांस्य मूर्तियों के निर्माण की परम्परा थी । हिमाचल में भी कांस्य मूर्तियों कै निर्माण की परम्परा के संकेत मिलते हैँ । जिला शिमला, निरमंड, भरमौर जजीरा, छेतराहड्री में इन मूर्तियों के निर्माण केन्द्र रहे हैँ । स्वांद कार्तिकेय गणेश, उमा-महेश्वर, विष्णु, महिषासुर मर्दिनी आदि रूप कांस्य मूर्तियों में में लोकप्रिय रहे ! छटी शती की कार्तिकेय कांस्य मूर्ति अत्यन्त भव्य हे । हाटक्रोटी मन्दिर की महिषमर्दिनी मूर्ति सातवीं शती की बताईं जाती है । यह मूर्तिकला का सुन्दर उदाहरण डै-एक-एक अंग सटीक तथा सप्राण है । ब्रहगैर तथा चतरारी (चम्बा) के मन्दिरों में अष्टधातु से निर्मित भव्य प्रतिमाएं हैं । इचफे निर्माता प्रसिद्ध मूर्तिकार गुम्मा कहे जाते हैँ, जिनका सम्बन्ध चम्बा के राजा मैरुं वर्मन (आठवीं सदी) से बताया जाता है । लखना देवी, नरसिंह, शक्सिदेवी, नंदी की मूर्तियों मेँ उच्चकोटि का क्लाबोध झलकता हे । चम्बा के हरिराय मन्दिर की नवीं शती मेँ निर्मित चम्बा शेली की विष्णु मूर्ति भी अपना उपमान आप हे । इस अष्टधातु की भारी मूर्ति के सम्बन्ध में डॉ० मोती चन्द्र का कहना है कि पूरी दुनिया में इस प्रकार को किसी मूर्ति कं अस्तित्व का ज्ञान नहीं । ॰यह चतुर्मुखी 1.17 मीटर ऊंची मूर्ति नवकम्भीयुवत्त स्तप्यों पर स्थित हे ।
लकडी की मूर्तियां व्रद्योर के लखना देवी मन्दिर, शक्ति मन्दिर (चतरारी’), मुकुत्ता देवी मन्दिर (उदयपुर), हाटक्रोटी के शिव मन्दिरों में अपनी भव्यता लिए हुए हैं । अघिकशि मूर्तियां, छतों, दीवारों, द्वारों पर खुदी हैँ । प्रदेश में प्राप्य अधिकांश मूर्तियां पत्थर से निर्मित हैँ । मसरूर कै आठवीं शती कै मन्दिरों की पाषाण प्रतिमाओं में सादगी हे । महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति एँ रेखाओं की व्यवस्था और कलात्मकता स्पष्ट हे । नागर, जगत सुख तथा दशाल एँ मूर्तियों की भव्यता दर्शनीय डै । चम्बा की विष्णु तथा लदमी मूर्तियों का निर्माण काल दसवीं शती हे और ये मूर्तियां परवर्ती गुप्त काल तथा राजपूत शेली फा समन्वित प्रतीक हैं । सुंलू में कार्लिर्कय की मूर्ति भी संतुलित तथा मव्य है । न्निलोक्लाथ मन्दिर (मंडी) की काली देवी, महादेव मन्दिर, पंचवक्ता शिव, अर्धनारीश्वर आदि अनेक मूर्तियां कला का उत्कृष्टतम उदाहरण है । जनजातीय क्षेत्रों में उपलब्ध मूर्तियों का स्वरूप स्थानीय जनन्धारणाओं वठे अनुरूप हे । ग्रामीण क्षेत्रों की युगा मढियों मेँ गूंगा, कूटडी तथा उनकी सेना की मूर्तियर’ पत्थर से कलात्मक ढंग से तराशी गई हे ।


काष्ठकला
इस प्रदेश में काष्ठकला कै दो रूप उपलब्ध हैँ काष्ठ मन्दिर तथा लकडी मेँ उकँरी गई मूर्तियां एवं चित्र ! प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों मिधल, छत्राहड्री, भरमीर, पराशर, करसोग, मूरंग, सराहन, यिल्बा, मनाती आदि में निर्मित काष्ठ मन्दिर वास्तुकला कं अन्यत्तमपैउदाहरण हैँ । लकडी पर खुदे चित्र भी ब्रेजोड़ है । पाश्चात्य विद्वान हर्मन गोटूज ने इन मन्दिरों मेँ उपलब्ध काष्ठकलाकृतियों की भूरि भूरि प्रशंसा की हैँ । उसदृहे अनुसार ये कलाकृतियाँ अदूभुत है । नीरय (शिमला) कै सूर्यं मन्दिर कै प्रवेश र्द्धरर पर उल्कीर्ण नंदीन्धारोही शिव, बीजट देवता (चौपाल)कै मन्दिर के प्रवेश द्वार पर उस्फीर्ण सैनिकों, खडूग नृत्य आदि के दृश्य अत्यन्त सजीव एवं चमत्कारी है । मलाना (कुल्लू) के एक स्तम्भ पर मैथुन क्रिया का दृश्य है! घरों कै द्वारों, स्तम्भी, छतों, बरामदों में भी लकडी की वल्ला कीं भव्यता दृष्टिगोचर होती है । कुल्लू शिमला, चम्बा, भरमौर, कांगड़ा आदि के अनेक संपन्न घरों कं प्रवेश द्धार पर ऋद्धि-सिद्वि दाताश्री गणेश उल्कीर्ण मिलेंगे र स्तामों पर उस्फीर्ण पशु-पक्षी तथा जनन्तीवन से सम्बद्ध दृश्यसहज ही दृष्टिगोचर होते हैं । चम्बा कै पहाडी शैली वो मन्दिरौं में लकडी पर जिस निपुणता तथा एकाग्रता से पौराणिक प्रसंगों, गन्धर्थों, अप्सराओं का उल्कीर्ण हुआ हैं, यह सिद्ध करता है कि चम्बा में काष्ठकला चरमोत्कर्ष पर थी!


हस्तशिल्प
पहाडी लोककला-शिल्प में पहाडी रुमाल; जिसे चम्बा रुमाल के रूप में प्नख्याति प्राप्त हे, का विशिष्ट स्थान है । ऐसी मान्यता है कि यह कला जम्मू से चम्बा में आई और राजा संसारचन्द्र के शासनन्काल में इस कला का प्रसार कांगड़ा तथा राज्य कै अन्य भागों में हुआ । यह मी कहा जाता है कि इस अनूठे हस्तशिल्प का श्रीगणेश राजा जयसिंह के कात में हुआ । चम्बा रुमाल में किसी ऐतिहासिक प्रसंग या रासलीला कै दृश्यों को दोहरे टांकी की कढाई से प्रस्तुत किया जाता है । यह कार्य इतनी निपुणता तथा कुशल सूक्ष्मता से किया जाता है कि यह जान पाना सहज नहीं होता कि कौन-सा माग सीधा है और कौन-सा उल्टा । इस कलात्मक कृति को विवाह सम्बन्ध या मित्रता कै प्रतीक कै रुप मैं भेंट किया जाता है । चम्बा नरेश गोपाल सिंह ने, कुरुक्षेत्र युद्ध चित्रित रुमाल, ब्रिटिश रेजीडेंट को पेंट किया था । अब यह रुमाल विक्टोरिया एवं अल्बर्ट संग्रहालय लंदन में सुरक्षित है । आमतीर पर ये रुमाल वर्गाकार होते है, अघिक समाई क्या कम घीड़ाई भी देखने मै आई है । इन रुमार्तों पर रंगर्नपेरंगे फ्लो रेश्मी धागों से रासलीला; कृष्णलीला, राग-रांगनिर्यों, पीरराणिक ट्टूक्यों का सुन्दर अंकन होता है । प्लाकप्ती में कशीदे गए चित्रों के मध्य गोलाकार शीशों से मी सज्जा की परम्परा है ।
चम्बा में चर्म हस्तशिल्प ने व्यवसाय का रुप धारण कर लिया है । चम्बा में रियासती काल से ‘चम्बा चप्पल‘ निर्माण का कार्यं हो रहा है, परन्तु अब यह हस्तशिल्प व्यवसाय का स्म धारण कर गया है । मर्दाना चप्पलों पर यधपि सुनहरे तिल्ले का काम नहीं होता तथापि इनके डिजाइन आकर्षक होते हैं । महिलाओं कै लिए बनाई गई चप्पलों पर सुनहरी काम प्रचलित है ।
पहाडी हस्तशिल्प कला के अनुपम नमूने थापड़ा, क्रोहारा (दीवार पर टांगने का कपडा), चोलियों, टोपियों पर की गई कशीदाकारी कै रुप मैं मिलते हैं १ कुल्लई, सिरमौरी, किन्यौरी तथा लाहोली टोपियों में मी इस शिल्प का भव्य रुप साकार दुआ हे । कुल्लू के शालन्दुशाले, लाहौल कं नमदे, गलीचे भी अपने कलान्सीष्ठव के कारण विख्यात हैं । रंग-बिरंगे पुराने कपडों की कतरनों को जोडकर निर्मित्त बिछोने मी कम आकर्षक नहीं होते । कपड़े को रंगाई तया छपाई कभी यहां की हस्तकला का महत्त्वपूर्ण अंग रहा है । श्री लाकवुड किपलिंग ने इस कला की सराहना इस प्रकार की है-‘यह विद्या कांगड़े की असाधारण विशेषता है । यहां छपे हुए कपडों मेँ निश्चय ही दिल्ली से भी अघिक सफाई पाईं जाती है ।” जनजातीय लोग आमतौर पर फराहड़े तथा छींबे जाति कै लोगों के द्वारा छापे गए”. रंगे गए वत्वों का प्रयोग करते हैं । गद्दणों कीं लुअत्तिड्रिर्यो (गाउन जैसा वस्त्र) तथा चोले मेँ इसी लोककला कै दर्शन होते हैं । लोककला का प्रयोग यहां निर्मित आभूषणों में भी मिलता है । कुल्लूहँ सिरमौरी किन्दौरी, मंगवाती, भरमौरी जनजातीय महिलाओं कं आभूषणों मॅ यह कला कलअनुपम रुप में साकार हुई है । लोककाना का एक रूप कास्य तथा पीतल फै बर्तनों पर चित्रलेखन है । कागड़ा के गंगथ उपनगर में पीतल कं बर्तनों का कार्यं प्रसिद्ध रहा। पीतल कं जलपदृत्रों-मुसरब्दों, चरोटियों (पीतल के बड़े बर्तन), गिलासों आदि पर “फ्लोरल पेटिंग’ तथा सूक्ष्म-चित्र-परम्परा विद्यमान थी । अब भी चम्बा, कुल्लू सिरमौर, किन्तोर कं जनजातीय घरानों में इस प्रकार कं बर्तन सुरक्षित हैं । किम्मीर, कुल्लू आदि क्षेत्रों मेँ मुखौटे बनाने की भी परम्परा है । इन मुखौटों का प्रयोग लोक-नाटूयों तथा लोक-नृत्यों में होता है । इस प्रदेश में ‘गोदना’ की परम्परा भी प्रचलित हे । स्वियां इस कार्य में होने वाली पीडा को दांत तले दबा, बडी रुचि से शरीर के बिभिन्न अंगों पर गोदना गुदवाती है । इस कला से बिश्वास तथा परम्पराएं जुडी हैँ ।


हिनौप्लास्टूरी
इसे लोककला का नाम दें या शल्य क्रिया का कमाल, कांगड़ा इस विशिष्ट कार्य-विधि के कारण विश्व-भर मेँ विख्यात रहा है । श्री बार्नस की सन् 1850 की ‘सेटलमेंट रिपोर्ट’ में इस हुनर की चर्चा यों है-‘ईं “हिनोप्लारुटूरी'” में कांगड़ा के सर्जन कमाल की दक्षता रखते हैँ । ये लोग कटी हुईं नाक की जगह नईं नाक लगा देते हे । यह नाक असली नाक की भान्ति आण शक्ति का पूरा काम देती है । इसके लगाने कै लिए व्यक्ति को कपोल या मस्तक से सानुबंध मांसपिंड काटकर कटी हुई नाक के स्थान पर ‘पर दिया जाता हे । हाथ की सफाई कं कारण यह आरोपण कृत्रिम मालूम नहीं पड़ता और चेहरे कै सौन्दर्य में भी कोई अन्तर नहीं पड़ता ।” मेक्समूलर ने भी स्वीकार किया हे कि महारानी विक्टोरिया के शासनकाल में यूरोप के डॉक्टरों ने यह कला भारत के सर्जनों से सीखी थी । श्री रघुनन्दन शास्वी ने अपने एक लेख में दर्शाया है कि उन्होंने 1927 में इस जाति के अन्तिम सर्जन सुन्दर से मुलाकात की थी । उस समय उसकी आयु 70-75 वर्ष की थी । श्री सुन्दर ने श्री शास्वी के सम्मुख ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए जो इस शल्य किया कै साक्षी थे । इस विधि का पालन करने वालों को “नकेहड़े’ सम्बोधन प्राप्त था ।

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