यदुवंश की राज्य-व्यवस्था

यदुवंश की राज्य-व्यवस्था

यदुवंश की राज्य-व्यवस्था

जिस तरह वैवस्वतं मनु के पुत्रों में से एक पुत्र इक्ष्वाकु ने सूर्यकुल की स्थापना की, उसी प्रकार किसी अन्य मनु की पुत्री इला के माध्यम से चन्द्रकुल की परम्परा स्थापित हुई। चन्द्रवंश का श्री गणेश यद् से हुआ। चन्द्रवंश में ययाति नाम का एक मात्र दिग्विजयी राजा हुआ। पुराणों में उसके चक्रवर्ती सम्राट होने का वृत्तान्त मिलता है। ययाति के पांच पुत्र थे : यदु, तुर्वसु, दुह्य, अनु और पुरु। ययाति के छोटे पुरु को प्रतिष्ठान का राज्य मिला। उसके वंशज पौरव कहलाए। यदु का राज्य पश्चिम में केन, बेतवा और चम्बल नदियों के प्रदेश में बना। यदु के वंशज यादव कहलाए। पुराणों में यदुवंश का इस प्रकार आरम्भ माना गया है। यदु के सहस्रजित, कोष्ट, नल और नहुष चार पुत्र जन्मे। सहम्रजित के शरतजित, शतजित के हैहय, हेहय और वेणुहय नाम के तीन पुत्रों ने जन्म लिया। हेहय इस वंश का राजा था। उसने और उसके वंशजों ने यादवों की कीर्ति का विस्तार किया। उनसे पहले ऐक्ष्वाक व महाराज मान्धाता की विजय ने यादवों को शक्तिहीन कर दिया था। अनेक यादव राजे मान्धाता से पराजित होकर उत्तर, पश्चिम और दक्षिण की दिशा में भागे और जहां गए, वहां उन्होंने अपने राज्य स्थापित कर लिए। कुछ यादव राजे, जो अपने प्रदेश में बने रहे, उन्हें मान्धाता का करदाता सामन्त बनकर जीवन-यापन करना पड़ रहा था। हैहयवंशीय राजाओं ने अपनी विनष्ट प्रतिष्ठा और ख्याति को फिर से अर्जित किया उन्होंने उत्तरी भारत की ओर सफल विजय-अभियान सम्पन्न किए और काशी इत्यादि के भू-भागों पर अपना अधिकार जमा लिया। उन्होंने अयोध्या की शक्ति को दुर्वसु बनाकर अपनी शक्ति का फिर से चहुंमुखी विस्तार किया। हैहय से महिष्मान तक सभी प्रतापी राजा हुए। महिष्मान बहुत प्रतापी राजा प्रमाणित हुआ।

यदुवंश की राज्य-व्यवस्था
यदुवंश की राज्य-व्यवस्था

उसने पूर्व की ओर आगे बढ़कर काशी को जीता और अपने राज्य में मिला लिया। महिष्मान ने महिष्मती नामक नगरी बसाई। कृतवीर्य का पुत्र सहस्त्रार्जुन था, जिसको कार्तवीर्य भी कहते थे। यह बहुत यशस्वी तथा प्रतापी शासक हुआ है। पुराणों में इससे सम्बन्धित अनेकों किंवदतियां प्रचलित हैं। इसने एक बार रावण को, जो अपनी विजय के उन्माद में महिष्मती पर आक्रमण कर बैठा था, बन्दी बना लिया और चिरकाल तक बन्दों बनाए रखा। सम्भवत: यह रावण नाम किसी राक्षस जाति के रावण जैसे गुण-दोषों वाले विशेष व्यक्ति के लिए प्रयुक्त नहीं किया गया वरन् उस प्रकार के व्यक्तियों के लिए किया गया है। सहस्रार्जुन के विषय में एक अनुश्रुति यह भी है कि उसका भृगुगोत्र के ब्राह्मणों से, जो नर्मदा नदी के तटवर्ती प्रदेश में रहते थे, और हैहयों के राजपुरोहित थे, से वैमनस्य हो गया था । ब्राह्मण लोग वह स्थान छोड़कर अन्यत्र चले गए थे। वहां जाकर औ्व मुनि ने कान्यकुब्ज के राजा गाधि की कन्या सत्यवती से विवाह कर लिया था। और्व मुनि का पौत्र परशुराम बहुत वीर तथा प्रतापी था। वह अपने पितामह की अवज्ञा के कारण हैहयों से शत्रुता का भाव रखता था। कार्तवीर्यार्जुन का परशुराम द्वारा वध किया गया परशुराम की शक्ति के विस्तार ने हैहयों की उन्नति में बाधा उपस्थित की। वे कुछ काल के लिए शक्तिक्षीण हो गए। फिर भी यादवों की कई शाखाएं बनती गई और उनका संख्या मे विस्तार हुआ। कई पीढ़ियों पश्चात् कुकुर के भाई अजमान के आठवीं पीढ़ी पर शूरसेन का जन्म हुआ। उनके भारिया नाम की पत्नी से वसुदेव इत्यादि दस पुत्र हुए। वसुदेव को आमकदुंदभी भी कहते हैं। वसुदेव के पांच बहिनें थीं। उनके नाम पृथा, श्रुतदेवी, श्रुतकोर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी थे। पृथा को शूरसेन ने अपने मित्र कुन्तिभोज को गोद दे दिया। कुन्तिभोज की दत्तक कन्या होने के कारण उसका नाम कुन्ती हुआ। वही पाण्डु की पत्नी कुन्ती थीं। उन्होंने युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को जन्म दिया। शूरसेन की एक कन्या श्रुतश्रवा का चेदिराज दशघोष से विवाह हुआ। जिन्होंने शिशुपाल को जन्म दिया। यादव वंशी राजाओं की कुछ घटनाएं हैं जिनका सम्बन्ध उनके समसामयिक ऐक्ष्वाकुवंशी राजाओं से है। परशुराम और महाराजा रामचन्द्र समकालीन थे। इसी प्रकार सहस्रार्जुन और परशुराम के युद्ध का उल्लेख प्रमाणित करता है कि हैहयवंशीय कार्तवीर्यअर्जुन और महाराज राम लगभग समकालीन थे। हो सकता है इनमें दो-तीन पीढ़ी का अन्तर रहा हो । कार्तवीर्याज्जुन का पुत्र मधु भी सम्भवत: वही था जो मधुवन पर राज्य करता था। लवण इसी मधु के पुत्र का नाम था, जिसके अत्याचारों से जनता त्राहि-त्राहि कर उठी थी। श्रीराम ने अपने भाई शत्रुघ्न को लवण से युद्ध कर उसे राज्य-च्युत करने भेजा था। उस युद्ध में लवण मृत्यु को प्राप्त हुआ था।

शत्रुघ्न ने 12 वर्ष मथुरा पर राज्य करके अपने पुत्र शूरसेन को वहां का राजा बनाया था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसी शुरसेन के नाम पर मथुरा-प्रदेश का नाम शूरसेन-प्रदेश पड़ा था। लिंग पुराण, प्रमाणित करता है कि सहस्रार्जुन के पुत्र शूरसेन के ही नाम पर यह शूरसेन प्रदेश नाम पड़ा। मधुवन का राजा बहुत धर्मात्मा था। उसे रामायण में असुर अवश्य लिखा है परन्तु उस समय बहुत से असुर भी सुआचरण करके श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करने लगे थे उनकी संस्कृति समुन्नत बनी थी उनमें धार्मिक प्रवृत्ति उत्पन्न हुई और सत्यपरायणता का समावेश हुआ। प्रह्लाद और बलि जैसे शुभ्र जाति के लोगों का जन्म असुरवंश में ही हुआ था। मधु की प्रवृत्ति असुरों की होने पर भी वह मूल रूप में यादव था। यादवों में पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार सूर्यवंशी हर्यश्व का विवाह मधु की पुत्री मधुमती से हुआ। अपने भाई से विरोध होने से कारण ह्यश्व अपनी पत्नी के समझाने पर अपने श्वसुर मधु की शरण में गया होगा मधु ने अपने राज्य के दो भाग कर दिए। उसने मधुवन के पास का भू-भाग अपने पुत्र लवण को आमतेऔर सुराष्ट्र का शासन-भार सौंपा। इस प्रकार हर्यश्व की सन्तति सूर्यवंश की न रहकर चन्द्रवंश की समझी गई। हर्यश्व का मधुमती से यदु नामंक पुत्र जन्मा यह यदु ययाति-पुत्र यदु नहीं था। ययाति-पुत्र यदु का जन्म कई पीढ़ियों पूर्व हो चुका था। हर्यश्व-पुत्र यदु से आगे चलकर कई कुल प्रचलित हुए। शत्रुघ्न-पुत्र शूरसेन मथुरा-प्रदेश पर अधिक काल तक अधिकार न रख पाया। यह भू-भाग यदु-पुत्र और पौत्रों के अधिकार में आता गया। मथुरा भू-भाग पर एक बार फिर यादव वशी राज्य करने लगे। उनका राज्य कई पीढ़ी तक चला। उग्रसेन और उसका पुत्र कंस इसी वंश से थे। इसे अंधक वंश कहा गया है।


शूरसेन, जो वसुदेव के पिता थे, वृष्णि वंश से पैदा हुए थे। उन्होंने अपने नाम पर शौरपुर बसाया और अपना राज्य पृथक कंर लिया। इन्हीं के पुत्र का नाम वसुदेव था, जिन्हें उग्रसेन के पुत्र कंस की बहन देवकी ब्याही थी। श्रीकृष्ण और बलराम इन्हीं वसुदेव के पुत्र थे। बलराम रोहिणी से तथा कृष्ण देवकी से जन्मे।

श्रीकृष्ण

इस वंश में महाप्रतापी, यशस्वी वीर, राजनीतिज्ञ, धर्मज्ञ कृष्ण ने जन्म लेकर इसे गौरवान्वित किया, अद्वितीय बनाया। उनके समय में अंधक-वृष्णि-संघ स्थापित था। उग्रसेन उसके राज-प्रमुख थे। यह अध्याय आरम्भ करने से पूर्व श्रीकृष्ण के जीवनचरित का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना आवश्यक गतिविधियों में उसका आधार पूर्ण अथवा संक्षेप में आना आवश्यक बनेगा। देवकी के गर्भ से जन्म लेने के पश्चात् वसुदेव अपने बाल शिशु को, उसकी प्राणरक्षार्थ, कंस के भय-कारण, गोकुल में नन्दगोप के निवास-स्थान पर पहुंचा आए और नन्दगोप की पत्नी की कुक्षि से जन्मी पुत्री को उसके घर से लाकर वसुदेव ने प्रकट किया कि देवकी के गर्भ से कन्या ने जन्म लिया है। यह सब कंस को भ्रम में डालने के निमित्त किया गया था। कंस ने उस बच्ची की, देवकी-जन्मी
क्योंकि आगामी युग की मूल सन्तान मानकर हत्या कर दी।

कृष्ण नन्दगोप के घर पहुंच चुके थे। उनका वहां विधिवत लालन-पालन होने लगा। कृष्ण ने इस बीच अनेक कुतूहल और साहसिक आश्चर्यपूर्ण कार्य किए। उनके कार्यों में कई ऐसे थे जो अदम्य साहस और वीरता के परिचायक थे। उन्होंने अपने गोप-बन्धुओं की अनेक विपत्तियों से रक्षा की। उन्होंने जंगली जाति के बर्बर दैत्यों का संहार करके अपनी विशेष शक्ति तथा साहस का परिचय दिया। इनके इन कार्यों से कंस का सशंकित होना अनिवार्य था।कृ ष्ण ने गोकुलवासियों से कहा कि इन्द्र की पूजा न करके गोवर्धन की करें। कृष्ण ने गोवर्धन-पूजा का महत्त्व गोपों को समझाया तो वे सब उस पर सहमत बने और गोकुल में इन्द्र के स्थान पर सर्वत्र गोवर्धन पूजा जाने लगा। कृष्ण ने कालिया नाम के नागवंशी दैत्य का, जो अपने अगणित अत्याचारों से वहां के जन-जीवन विषाक्त बनाए हुए था, मर्दन करके उसे गोकुल से भाग जाने पर बाध्य कर दिया। अब दिन-दिन बलराम और कृष्ण के कामों का ब्यौरा कंस तक पहुंचने लगा। उसके
गुप्तचर गोकुल में घूम-घूम कर समाचार एकत्रित करते और कंस के पास पहुंचाते। स्थिति इतनी भयंकर’ बनी कि कंस ने इन दोनों को मथुरा बुलाकर उनकी वहां हत्या कराना ही श्रेयस्कर समझा । उस उद्देश्य की पूर्ति-निमित्त उसने अक्रूर को उन्हें मथुरा लिवा लाने का आदेश दिया। कंस की आज्ञा पाकर अक्रूर नन्दगोप के पास पहुंचा।

गोकुल में उस समय कृष्ण का एकछत्र राज्य था। वहां के गोप-गोपियां अपने कृष्ण के प्रेम और रूप के दीवाने थे। उन्हें अक्रूर को इस प्रकार कृष्ण को अपने साथ मथुरा ले जाना तनिक न भाया। कंस के प्रस्ताव ने गोकुलवासियों को स्तब्ध कर दिया था। यह स्थिति देख कृष्ण ने अपने स्वजनों को अनेकों भांति समझा- बुझाकर धैर्य बंधाया। सबको शान्त करके वह अपने भाई बलराम के साथ मथुरा के लिए प्रस्थान कर गए। अक्रूर समझ रहा था, उसे अपनी कूटनीतिपूर्ण चाल में सफलता मिली और कृष्ण-बलराम सोच रहे थे कि अन्याय और अत्याचार का अन्त सन्निकट है । वे कंस का वध करके जन-जन का त्राण कर पाने में सफल बनेंगे।

कस-वध

कृष्ण-बलराम के साथ कुछ अन्य गोपों ने भी मथुरा के लिए प्रस्थान किया। रात्रि समय कृष्ण-बलराम ने अक्रूर के घर पर निवास ग्रहण किया। प्रातः कौतूहलवश दोनों भाई अपने साथियों के साथ नगर-शोभा देखने निकल गए। नगर-निवासी उनके रूप-सौंदर्य को देखकर मोहित बने और उनके चारों ओर एकत्रित होकर उन्हें निहार- निहार कर अपने हृदय-कक्ष में भरने लगे। उनका स्थान-स्थान पर आदर-सत्कार हुआ। उसी समय मार्ग में उनका कुब्जा दासी से साक्षात्कार हुआ। वह कंस के.महल में उसे चन्दन लगाने जाती थी। मार्ग में कंस का धोबी मिला, जिसने इनका तिरस्कार किया। परिणामस्वरूप गोपों ने धोबियों के वस्त्र लूट लिए। उन्होंने सुन्दर वस्त्र धारण करके कुब्जा का चन्दन अपने मस्तक पर लगाया और भ्रमणार्थ आगे बढ़ते चले गए। वे कंस की नगरी मथुरा की अनुपम शोभा देखकर प्रसन्न हो रहे। कंस ने कृष्ण-बलराम और इनके साथियों के विनाशार्थ अपने भवनद्वार पर एक मदोन्मत्त हाथी खड़ा किया हुआ था। वह उसी हाथी-द्वारा उनका वध कराने की ताक में था। जब कृष्ण-बलराम वहा पहुचे और हाथी उनकी ओर बढ़ा तो कृष्ण ने हाथी के दांत उखाड़कर एक ओर फेंक दिए। हाथी का भयंकर चीत्कार करते-करते प्राणान्त हो गया। दर्शक इसे देखकर आश्चर्यचकित रह गए। अपने हाथियों की यह दुर्दशा देख कंस ने अपने मल्लों मुष्टिक और चाण्डूर को कृष्ण-बलराम का वध करने भेजा। इन मल्लों की भी कंस के हाथियों जैसी ही स्थिति बनी।

कंस क्रोधित होकर अपनी सेना को कृष्ण-बलराम से लड़ने भेजना चाहता था, परन्तु उससे पूर्व ही कृष्ण ने कंस को उठाकर जमीन पर पटक दिया। कंस के प्राण-पखेरु उड़ गए और इस प्रकार कस के अत्याचारी युग की कृष्ण ने समाप्ति की।

कंस का प्राणान्त होने पर प्रजाजन ने चाहा कि श्रीकृष्ण मथुरा की शासन- व्यवस्था संभालें पर कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अंधक-वृष्णियों के संघीय राज्य की फिर से स्थापना की। उन्होंने कंस के पिता उग्रसेन को ही मथुरा का राज्यप्रेमुख बनाया और उसी को सब अधिकारों से सुसज्जित किया। कंस की दोनों पलियां, जो जरासंध की पुत्रियां थीं, उन्होंने कंस की मृत्यु-पश्चात् अपने पितृ-गृह जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया| यह सब सुनकर जरासंध बहुत क्रोधित हुआ और वह तभी से कृष्ण से वैमनस्य बरतने लगा।

उग्र जरासंध

जरासंध उस समय विशाल शक्ति सम्पन्न शासक था। वह चक्रवर्ती सम्राट बनने का स्वप्न देख रहा था। वह हर समय विजयोल्लास में मदान्ध रहता। उसने कई प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर, उन्हें अपने अधिकार में ले लिया था। उसे अपने स्वप्न को साकार करने के मार्ग में कृष्ण और उसके द्वारा स्थापित संघ बाधक होते प्रतीत हुए। उसने अपने जामाता का बदला लेने तथा अपना वैमनस्य निकालने के लिए कई बार मथुरा पर आक्रमण किया, परन्तु एक बार भी सफलता न मिली और हर बार मुंह की खाकर वापस लौटना अनिवार्य बना। तब उसने सत्तरहवीं बार कालयवन की सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण करने की योजना बनाई। इस भयंकर आक्रमण.की सूचना जब अंधक-वृष्णि संघ को मिली तो उन्हीं में से कुछ ने कहा कि आक्रमण की यह समस्या श्रीकृष्ण और जरासंध के व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण है। अर्थात्कृ ष्ण के कारण संघ को जरासंघ से शत्रुता निभानी पड़ रही है कृष्ण ने इस अपवाद का नीतिपूर्ण निराकरण किया। उन्होंने सजातियों से कहा जिनके कारण मथुरावासियों को जरासंध का आक्रमण सहन करना पड़ रहा है, उन्हें मथुरा छोड़कर अन्यत्र चले जाना चाहिए। कृष्ण मंथुरा छोड़कर बाहर चले गए। कृष्ण ने पुनर्वास के लिए द्वारिका- पुरी को उपयुक्त समझा। यह स्थान दूर होने के कारण जरासंध की पहुंच से बाहर था। कृष्ण के प्रस्थान से कृष्ण का साथी-दल जरासंध से तो बच निकला, परन्तु कालयवन तो उसी ओर से मथुरा पर बढ़ता चला आ रहा था। उससे उनकी भेंट अवश्यंभावी बनी। कृष्ण कालयवन की सेना से लड़ने जाते और साथ-साथ द्वारिका की दिशा में अग्रसर होते। मार्ग में कृष्ण ने बड़ी चतुराई से काम लिया। कालयवन
की मुचकुन्दजी से भिड़त करा दी भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें कालयवन मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसकी सेना बिखर गई और कृष्ण अपने साथियों सहित द्वारिका जा पहुंचे। इस समय कृष्ण तो द्वारिका अवश्य पहुंच गए, परन्तु जरासंध को मथुरा पर अधिकार करने का पूर्ण अवसर मिल गया उधर कृष्ण को भी द्वारिका की स्थिति संवारने का अवसर मिला।

राजनीतिक स्थिति

उस समय हस्तिनापुर की यह स्थिति थी कि कौरव पांडवों में युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी। कृष्ण ने पारस्परिक फैसला कराने का भरसक प्रयास किया, परन्तु शकुनि और दुर्योधन ने कृष्ण द्वारा प्रस्तावित सुलह को सफल न बनने दिया। कृष्ण का प्रयास विफल होने पर युद्ध के अतिरिक्त अन्य कोई चारा न था। युद्ध और संघर्ष की यह स्थिति दो परिवार, कौरव और पांडवों के बीच थी, झगड़ा पारिवारिक ही था, परन्तु ऐसी ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई कि उसकी चिंगारियों से देश का कोई कोना बच न पाया। देश के सब राजे प्रथम अथवा दूसरे पक्ष की ओर से युद्ध करने को मैदान में उतर आए। इस गृह-कलह ने महायुद्ध का रूप धारण कर लिया जो अठारह दिन भयंकर ज्वाला उगलता रहा। युद्ध में आधुनिकतम समकालीन अस्त्र- शस्त्रों का प्रयोग किया गया युद्ध में अगणित सैनिक तथा राजा खेत रहे। महान योद्धा और सेनापति मृत्यु को प्राप्त हुए। कौरव हारे और समूल नष्ट हुए। पांडव युद्ध में विजयी अवश्य हुए परन्तु उनके सब बन्धु-बांधव युद्ध की भेट चढ़ गए। कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गंीता का उपदेश महाभारत की महान उपलब्धि है।

यादव-पतन

महाभारत के इस युद्ध का यादवों पर बहुत बड़ा प्रभाव हुआ। यादव कृतवमां के नेतृत्व में कौरवों की ओर से लड़े थे। युद्ध में अनेकों वीर यादव परमगति को प्राप्त हुए। यादवों में पुरुष कम और स्त्री-बच्चे अधिक रह गए। महाभारत के बाद यादवों का तीव्र गति से हास हुआ। जो यादव शेष भी रहे, वे प्रमादी हो गए। एक समय आमोद-प्रमोद में वे मदिरा पीकर आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। इस समय इतना उत्पात मचा कि सर्वनाश का दृश्य उपस्थित हो गया। यह देख बलराम को इतना क्षोभ हुआ कि वह समुद्र-यात्रा पर चले गए। श्रीकृष्ण दासक सारथी के साथ द्वारिका वापस लौटे और दासक से सब वृतान्त कहकर अर्जुन को लिवा लाने भेजा। वह चाहते थे कि जो स्त्री-बच्चे शेष बचे हैं। उन्हें अर्जुन लिवा ले जाएं।

तदुपरान्त श्रीकृष्ण व्याध के तीर से घायल हो मृत्यु को प्राप्त हुए। अर्जुन को द्वारिका आने तक वसुदेव उग्रसेन इत्यादि सब परमगति प्राप्त कर चुके थे। जब अर्जुन वहां आया तो उसे कोलाहल करते हुए स्त्री-बच्चे मिले। वह उन सबको अपने साथ लेकर चला। परन्तु मार्ग में उन सबको आभीरों ने लूट लिया। अर्जुन ने स्त्री-बच्चों को लाकर श्रीकण्ठ प्रदेश (पंजाब) में बसा दिया। इसके बाद परीक्षित को सिंहासन पर बिठाकर पाण्डव हिमालय की ओर अग्रसैर हुए।

Leave a Reply

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: