बेल का उपयोग किस तरह से किया जाता हैं ?

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बेल


श्रीफलस्तुवरस्तिवतो ग्राही रुक्षोग्निपित्तकृत्।
चातझलेष्महरी बत्यो लघुरुष्णश्च ग्राचन: ।।
[ -यह ग्राही, रक्तस्तंभक, शोथहर, दीपक, याचक एवं ज्वरघ्न होता है । इसका प्रयोग अतिसार, प्रवाहिका, ग्रहणी, रक्तार्श, ज्वर, पूयमेह व शुक्रमेह में होता है । ]
प्रजाति : बेल ।
वैज्ञानिक नाम : एपले मार्मेंलोस क्रोरेआ एक्स रौक्स. । अंग्रेजी नाम : वुड एपल ।
हिदीनाम : बेल ।
क्षेत्रीयनाम : बेल ।
ट्रेड : नाम बेल ।
परिवार : ख्तासी ।


वानस्पतिक परिचय
सारे भारत में, विशेषत: हिमालय की तराई में सूखे पहाडी क्षेत्रों मैं ४, ० ० ० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बैल जोप्ली रूप में फैला मिलता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के यास लगाया जाता है ।
१५ सै ३० फीट ऊँचे कँटीले वृक्ष फलों से लदे अलग ही पहचान में आ जाते हैं । पत्र संयुक्त बिपत्रक, गंध युवत और स्वाद में तीखे होते हैं । गरमियों मैं पत्ते जाते हैं तथा मई में पुष्प आ जाते हैं । फल अगले वर्ष मार्च से मई के बीच लगते हैं । फूल हरी आभा लिये सफेद रंग के ढोते हैं । इनकी सुगंध मन क्रो भानेवाली होती है । फल ५ से १७ सेंमी. व्यास के. होते हैं । खोल कडा व चिकना होता है और पकने पर हरे से सुनहरे पीले र’ग का हो जाता है । खोल क्रो त्तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है । बीज छोटे, बड़े व कई हौते हैं ।
बाजार में दो प्रकार के बॉल मिलते हैं-छोटे (जंगली) और बड़े (उगाए हुए ।) दोनों के गुण समान हैँ । जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बडा व काँटे कम होते हैं ।
संग्रह, संरक्षण एवं कालावधि-छोटे, कच्चे फलों का संग्रह कर उन्हें अच्छी तरह छीलकर गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर-सुखाकर बंद डिज्यों में नमी रहित शीतल स्थान में रखना चाहिए । औषधि प्रयोग हेतु जंगली खेल ही प्रयुक्त होते हैँ । खाने, शरबत आदि के लिए ग्राम्य या उगाए हुए फल प्रयुक्त होते हैं । इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है ।
भंडारण
साधारणत: अधिक समय तक भंडारण नहीं करना चाहिए । चार टुकडों में कटे, सूखे खेल गूदे को खाली बोरों में भंडारित करना चाहिए । पॉलीथिन बोरों का प्रयोन न कों । इसे १ ० से १ २ प्रतिशत आर्दता तक भंडारित करना उपयुक्त रहता है । भंडारण सूखे, साफ गोदाम मं करना आवश्यक हैँ । भंडारगृह नमी रहित व हवादार होना चाहिए ।
रासायनिक संघटन
बेल के फल की मज्जा में मूलत: निम्न ग्राही पदार्थ पाए जाते हैँ…म्युसिलेज, पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स । इसमें मूत्र रेचक संघटक है… मार्मेलोसिन नामक एक रसायन, जो स्वल्प मात्रा में’न्हीं विरेचक हैँ । इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जानेवाला एक हलके पीले रंग का तीखा त्तेल (करीब १ २ प्रतिशत) भी रेचक होता है । शकर ४. ६ प्रतिशत, उड़नशील तेल एवं तिक्त सत्त्व के अतिरिक्त २ प्रतिशत भस्म भी होती है । भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैँ । बिल्व पत्र मेँ एक हरा-यीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं । मूल व तने की छाल भी औषधीय गुणों से ‘भरी-पूरी है । छाल में कईं विशिष्ट एल्केलाइड, यौगिक व खनिज लवण होते हैं ।
आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्ष
पेक्टिन, जो बिल्य मज्जा का एक महत्त्वपूर्ण घटक तथा प्रामाणिक ग्राही पदार्थ है, अपने से बीस गुने अधिक जल में एक क्रोलाइडल घोल के रूप में मिल जाता हैं, जो चिपचिपा व अम्ल प्रधान ढोता है । यह घोल आँतो’ पर अधिशोषक (एड्सररवेंट) एवं रक्षक (प्रोटेबिटव) के समान कार्य करता है । वडी आँत में पाए जानेवाले मारक जीवाणुओं क्रो नष्ट करने क्री क्षमता भी इस पदार्थ में है । डॉ. धर के अनुसार जैल मज्जा के घटक घातक विषाणुओं के विरुद्ध मारक क्षमता भी रखते हैं । ‘इंडियन जनरल आँफ एक्सपेरीमेंटल के अनुसार बिल्व फल हुकव्रर्म (अंकुश-कृमि), जो भारत में सबसे अधिक व्यक्तियों को प्रभावित करता माया गया है, को मारकर बाहर निकाल सकने में समर्थ है । पके फल क्रो वैज्ञानिकों ने बलवर्द्धक तथा हदय क्रो सशक्त बनानेवाला तथा पत्र स्वरस को सामान्य शोथ, मधुमेह एवं श्वास रोग में लाभकारी पाया है ।
ग्राह्य अंग-फल का गूदा या बेल गिरी । पत्र, मूल एवं त्वकुं (छाल) का चूर्ण । चूर्ण के लिए कच्चा, मुरब्बे के लिए अधपका एवं ताजे शरबत के लिए पका फल लेते हैं । कषाय प्रयोग हेतु मात्र दिन में दो या तीन बार ।
क्वाथ : १ ० से २० मिली. (दो से चार चम्मच) ।
शरबत
२ ० से ४० मिली. (चार से आठ चम्मच) । पाचन संस्थान मेँ प्रयोग हेतु मूलत: बिल्व चूर्ण ही लेते हैं । कच्चा फल अधिक लाभकारी होता है । इसीलिए चूर्ण क्रो शरबत आदि की तुलना में प्राथमिकता दो जाती है ।
गुण
ग्राही, रबतस्तंभक, शोथहर, दीपक, पाचक, ज्वरप्न ।
प्रयोग
अतिसार, प्रवाहिका, म्रहणी, रक्तार्श, ज्वर, पूयमेह, शुक्रमेह ।
निर्धारणानुसार प्रयोग
मूल अनुमान शहद या मिस्री की चाशनी होते हैं । दाँत निकलते समय जब बच्चों को दस्त लग जाते हैं तब बेल का १ ० ग्राम चूर्ण १ २५ मिली. पानी में पकाकर शेष २ ० ग्राम सत्व क्रो ५ ग्राम शहद में मिलाकर दोतीन बार दिया जाता हैँ । पुरानी पेचिश _व कज्ज में पके फल का शरबत या १ ० ग्राम वेल १ ०० ग्राम गाय के दूध में उबालकर ठंडा करके देते हैं । संग्रहणी जब खून के साथ व बहुत वेगपूर्ण हो तो मात्र कच्चे फल का ५ ग्राम चूर्ण १ चम्मच शहद के साथ दो-चार चार देते हैं । कज्ज व पेचिश में लगभग १ ० ग्राम पत्र स्वरस दो से तीन घंटे के अंतर से चार-माँच जार दिमुंए जाने पर लाभ करता है । हैजे की स्थिति में बेल का शरबत या बिल्व’ चूर्ण पानी के साथ देते हैं ।
कोष्ठबद्धता में सायंकाल बेल की मज्जा मिस्री के साथ ली जाती है र इसमें मुरब्बा भी लाभ करता है । अग्निमंदता, अतिसार व उदरशूल में भी बिल्व का चूर्ण तुरंत लाभ पहुँचाता है । कच्चे फल का गूदा गुड के साथ पकाकर या शहद मिलाकर देने सै रवतातिसार व खूनी बवासीर में लाभ पहुँचाता है । पके फल का जहाँ तक हो सके, इन स्थितियों में प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसकी ग्राह्य क्षमता अधिक होने से हानि भी पहुँच सकती हैं । कज्ज निवारण हेतु पका फल उपयोगी है । पत्र का स्यरस जुलाई व्र अगस्त में निकाला जाता है । दूसरी ऋतुओं मैं निकाला गया रस उतना लाभकारी नहीं होता । काली मिर्च के साथ दिया गया पत्र स्वरस पीलिया तथा पुराने कज्ज में आराम पहुँचाता है । हैजे के बचाव हेतु भी फल मज्जा प्रयुक्त हो सकती है । मुख्य सावधानियाँक. फल का गूदा निकालने पर इसे चार भागों में काटना आवश्यक है; क्योंकि इसी प्रकार से यह विक्रय किया जाता है । ख. सुखाकर साफ़ गोदामों में भंडारित कों अन्यथा फकूँद इत्यादि लगने पर खराब हो जाता है ।

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