चीनी सभ्यता और संस्कृति

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चीनी सभ्यता और संस्कृति


पहले जमाने में चीन का देश कई अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था। चीन वाले खुद अपने मुल्क को ‘चुंग कुओ’ कहते हैं। ‘चुंग’ के मायने हैं ‘वीचका’, ‘हुआ’ का मतलब ‘फूल’ और ‘कुओ’ देश को कहते हैं। चीनी लोग मानते।हैं कि उनका देश पृथ्वी के ठीक बीचों-बीच में है। उसमें फूल बहुत होते हैं और लोग खूब सुख से जिंदगी बसर कर सकते हैं। चीनी सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ऊंची सभ्यताओं में से एक है।
शुरू जंमाने से उस देश के लोग आस-पास की कौमों को जीत कर अपने में मिलाते रहे या उन पर हुकूमत करते रहे। इसीलिये न उन दिनों चीन की कोई आवादी और इलाका दोनों बढ़ते चले गए। 1000 ई.पू. (ईसवी से पहले) के क़रीब ‘चीन’ एक राजकुल का नाम था। इस कुल के राजाओं का उन दिनों मुल्क के उस थोड़े से उत्तर पश्चिमी हिस्से पर राज था, जिसमें आज कल कानसु और शेन-सि के राज्य हैं। इस कुल के नाम पर।ही मुल्क का वह हिस्सा ‘चीन कुओ’ यानी ‘चीन राजाओं का देश’ कहलाने लगा । धीरे-धीरे इस कुल के राजाओं की ताक़त बढ़ी । उनका राज दूसरे सूबों पर भी फैला।
एशिया के बीच के हिस्से में उन दिनों बहुत से छोटे-छोटे देश थे, जो ‘पश्चिमी देश’।कहलाते थे। चीन कुओ के लोगों के साथ यहां के लोगों का आना जाना था इसलिये इन पश्चिमी देशों के लोगों ने सारे मुल्क को चीन नाम से पुकारना शुरू कर दिया।
वहां से यह नाम दक्षिण में हिंदुस्तान और पश्चिम में यूनान और रोम तक पहुंचा।
यूरोप में वह बिगड़ कर ‘चाइना’ हो गया। हिंदुस्तान के ‘महाभारत’ ग्रंथ में भी चीन देश का वर्णन, आता है, जिससे मालूम होता है कि हिंदुस्तान वालों को उस पुराने।ज़माने में चीन देश का पता था और उससे उनका कुछ न कुछ नाता भी था।

चीनी सभ्यता और संस्कृति


जापानी चीन को ‘दाइतांग’ या ‘महातांग’ कहते हैं। सबब यह है कि 618 चोटी पर थी। जापानी अभी सभ्यता की दृष्टि से बहुत पीछे थे सैंकड़ों जापानी।उन दिनों विद्या पाने के लिये चीन आए। चीन से लौट कर उन्होंने अपने मुल्क।में तरह तरह की विद्याओं का प्रचार किया। इन जापानियों में एक मशहूर नाम कोवोदारशी का है, जो 25 बरस तक चीन में रहा। कोबोदाशी को ‘कुंगहाई’ भी कहते थे। जापान लौट कर उसने जापानी भाषा लिखने के लिये चीनी लिखावट की मदद से एक लिखावट निकाली जिसे जापानी ‘काना’ या ‘काता काना’ कहते हैं। कोबोदाशी ही जापानी साहित्य का जन्मदाता माना जाता है। जापानियों ने सभ्यता चीन से सीखी । जापान का धर्म, यानी बीद्ध धर्म भी।हिंदुस्तान से चीन और वहां से कोरिया के रास्ते जापान पहुंचा। जापानी संस्कृति तांग
के ज़माने की चीनी सभ्यता की देन है । इसीलिये जापानी आज तक चीन।राजकुल।को ‘दाइतांग या महातांग’ कहते हैं।

सन् 1911 ई. में चीन में ज़बरदस्त क्रांति हुई। पुराने राजकुलों की।हमेशा के लिये खत्म हो गई। उस समय से चीन में, जो नया रिपब्लिक यानी जनतंत्री राज क्रायम हुआ, उसका नाम ‘चुंग हुआ रिपब्लिक रखा गया। चीन के लोग चीनी क़ौम में छः जातियां शामिल समझी जाती हैं। ये छै ‘त्सु’ कहलाती हैं। 1. हानत्सु, 2. मिआओत्सु 3. मानत्सु यानी मांचू 4. मांगल्सु यानी मोंगल 5. हुइल्सु यानी तुर्की मुसलमान और तांगत्सु यानी तिब्बती। इनमें हानत्सु की तादाद सबसे ज्यादा है। ये सबसे पुराने और चीन के खास बाशिंदे हैं। मिआओत्सु भी एक पुरानी और.सभ्य जाति है। इनकी तादाद बहुत कम है। इनमें ज्यादातर हानत्सु में मिल कर.एक हो चुके हैं और बहुत थोड़े से दक्षिण पश्चिम के पहाड़ों में अभी तक अपनी
अलग आबादियों में बसते हैं। मानत्सु पहले मांचूरिया के रहने वाले थे लेकिन अब.हानत्सु के साथ मिलकर वे बिल्कुल एक हो गए हैं। मांगल्सु मंगोलिया के थे लेकिन.ये भी ज्यादातर हानत्सु में घुल मिल गए हैं। हुइत्सु चीनी तुर्किस्तान (आंग) के रहने.वाले मुसलमान हैं। वे भी बिना किसी भेदभाव के साथ हानल्सु में मिल जुल कर.रहते हैं। तांगत्सु यानी तिब्बतियों की हालत भी क़रीब-क़रीब वैसी ही है जैसी मंगोलिया.वालों की। इनकी तादाद भी बहुत थोड़ी है। इस तरह से छै जातियां चीन में केवल.नाम की अलग-अलग जातियां हैं। मर्दुमशुमारी का तरीक्रा चीन में हज़ारों बरस से चला आता है।. हजरत ईसा
के जन्म के समय चीन की आबादी आठ करोड़ थी, सन् 1928 मे हो गई और इस समय एक अरब दस करोड़ है।
दुनिया की सभ्य क़ौमों में सबसे पुरानी चार हैं : मिस्री, सुमेरी-बाबुली, हिंदी और चीनी। इनमें हिंदी और चीनी अभी तक दुनिया के सामने हैं। इन दोनों क़ौमों।में कोई ऐसी खास बात जरूर होगी जिसकी वजह से ये इतने हजारों बरस कायम रहीं और अभी तक क़ायम है। चीनियों की तीन सबसे बड़ी विशेषताएं यह हैं :
(1) सहनशीलता यानी बर्दाश्त,
(2) परिस्थिति के बदलने के साथ-साथ अपने को
बदल लेने की योग्यता और
(3) भेदों और भिन्नताओं में सामंजस्य और एकता पैदा
कर लेने की प्रवृत्ति । इनके अतिरिक्त चीनियों में तीन और खास गुण हैं : (1) शांति।बनाए रखने की इच्छा, (2) मिलने-जुलने में शिष्टता और मिठास, और (3) दिल की सच्चाई। दूसरी कौमों की तरह चीनियों के चरित्र में कतिपय दोष भी हैं। चीनी।उन्हें दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। सारी दुनिया अब एक होती जा रही है। चीनी भी दूसरी सभ्यताओं की अच्छी बातों को अपनाते जा रहे हैं ।

दुनिया की प्राचीन सभ्यता


यूरोप के विद्वान अकसर मिस्र और बाबुल की सभ्यताओं को सबसे पुरानी मानते हैं। लेकिन चीनी सभ्यता सबसे पुरानी और जीवित सभ्यता है।।चीनी इतिहास के मुताबिक योउत्साओ ने सबसे पहले घर बनाया और लोगों।को घरों में रहना सिखाया । सुएइजेन ने आग ईजाद की और लकड़ी जलाकर लोगों।को खाना पकाना सिखाया। ये दोनों ईजादें दस हजार साल से भी बहुत पहले की।हैं। इसके बाद फुहिसि ने जाल डाल कर मछली पकड़ना और सितार बजा कर गाना सिखाया । उसी ने शादी का रिवाज डाला। शादी के लिये नियम बनाए और कुटुम्ब की बुनियाद डाली। उसने ‘आठ शक्लें’ ईजाद की जिनसे बाद में बढ़ते-बढ़ते आज।कल की चीनी लिखावट ईजाद हुई। साल, महीनों वगैरह के जरिये समय का माप भी उसी ने ईजाद किया। शेन नुंग ने फावड़ा और हल ईजाद किया और लोगों को।खेती करना सिखाया। उसने सबसे पहले मंडी खोली और लोगों को एक चीज के बदले में दूसरी चीज देना-लेना सिखाया । बहुत सी जड़ी-बूटी पर तजुरबा करके उसने रोगों के इलाज की बुनियाद डाली। उसने एक तरह का पंचांग यानी कैलेण्डर बनाया।

ये सब बातें भी करीब-करीब दस हजार साल पहले की हैं। इसके बाद से इसी तरह बहुत लोग तरह-तरह की नई ईजादें करते रहे। सन् 2000 ई.पू. में हुआंग-ति यानी।पीला सम्राट’ चीन पर हुकूमत करता था। उसकी प्रजा बहुत खुश और सुखी थी। उसके जमाने में और बहुत सी नई नई ईजादें हुई, जिनमें से कुछ ये हैं: 1. टोपी।और सिले हुए कपड़े, 2. गाड़ी और किश्ती, 3. कुंडी-सोटा, 4. तीरकमान, 5. दिशा।देखने का कम्पास, 6. धातु के सिक्के, और 7. मुरदे को रखने के लिये कफन। ज्योतिष में यानी सिंहतारों और नक्षत्रों का अध्ययन करने में और अलग-अलग मीसमों के तय करने में भी उस ज्ञमाने में खासी नई नई ईजादें हुई।
सम्राट हुआंग-ति के समय तक (2697-2598 ई. पू. तक) ऊपर की सब चीजें चीन में ईजाद हो चुकी थीं। धर्म, दर्शन, फलसफा और सदाचार शास्त्र ये तीनों कुछ।समय बाद हिया, शांग और चोउ राजकुलों के समय में यानी दो हजार ई.पू. से 1000 ई.पू. तक के जमाने में पूरी तरह तरक्की को पहुंचे। वह जमाना चीनी सभ्यता के इतिहास में बल्कि दुनिया की तरक्की के इतिहास में सुनहरा जमाना था।
किसी भी कौम के इतिहास में लिखने की विद्या ईजाद हुई इस बात का बड़ा महत्व है। हुआंग-ति के कई वजीर थे जिनमें एक ‘इतिहास का वजीर’ कहलाता था। त्सांग-चि उसका इतिहास का वजीर था। उसे आजकल की चीनी लिखावट का ईजाद करने वाला माना जाता है। असल में उसने नई लिखावट की ईजाद नहीं की बल्कि फुहिसि की ईजाद की हुई पुरानी लिखावट को सुधारा और तरक्की दी। वहुत से लोग कहते हैं कि चीनी लिखावट को सीख सकना दूसरे देश के लोगों के लिए बहुत मुशकिल है।

लिखावट (लिपि) हजारों बरस से ज्यों की त्यों चली आ रही है। सारे चीन में जिसका रकबा यूरोप के रकबे से ज्यादा है, यही एक लिखावट काम में आती है। इस एक लिखावट की वजह से चीनी कौम की एकता को बनाए रखने में बहुत बड़ी मदद मिली है। जब से चीन में लिखावट ईजाद हुई तभी से किताबें खासकर ऐतिहासिक किताबें लिखी जानी शुरू हो गई इनमें से बहुत सी किताबों के अब सिर्फ नाम रह गए हैं और कुछ किताबें अभी तक मीजूद हैं। इनमें सबसे पहली किताब फुस्ति के वक्तों की ‘यि-चिन’ नाम की है जिसके मायने ‘परिवर्तनों के नियम” हैं यह ‘शांग हसु’ 2357 और 2208 ई.पू. के बीच की लिखी हुई है। ‘शिह-चिन 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक के वहुत से गीतों का एक संग्रह है जो महात्मा कन्फूशियस का जमा किया हुआ है। वेदों के सिवाय दुनिया की और कोई किताब इन चीनी किताबों से ज्यादा पुरानी नहीं है। इन किताबों के अलावा बहुत से पुराने घरेलू गीत जगह-जगह गाए जाते हैं या किताबों में मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर 2300 ई.पू. और 2200 ई.पू. के बीच के दो गीत ये हैं (1) “जब सूरज निकलता है । तब मैं उठ जाता हूं, जब सूरज डूबता है मैं आराम करता हूँ,।पानी पीने के लिए मैं कुआं खोद लेता हूं, और खाना खाने के लिए जमीन जोतता हूं, सम्राट (ति) की हुकूमत सम्राट के पास रहे
मुझे उससे क्या लेना देना !
(2) “ऐ खुशकिस्मत बादल ! फैला दे
अपने रंगों को चारों तरफ,
ऐ सूरज ! और ऐ चांद ! चमकाओ
और सुंदर बनाते रहो
दिन और रात को हमेशा हमेशा”

विज्ञान का प्रारंभ भी चीन से हुआ था । 2000 ई.पू. और 1000 ई.पू. के बीच में चीन में ‘लुयि’ यानी छः विद्याओं और ‘लुकुग’ यानी छः दस्तकारियों के सीखने का खास रिवाज था । छः विद्याएं थीं- (1) ‘लि’ यानी शिष्टाचार, (2) ‘यो’ यानी संगीत ( 3) ‘शेह’ यानी तीरंदाजी, (1) ‘यु’ यानी गाड़ी, रथ चलाना, (5) ‘शु’ यानी लिखना और (6) ‘सु’ यानी गणित ( मैथेमेटिक्स)। छः दस्तकारियां थीं- (1) ‘तुकुंग’ यानी इमारत का काम, (2) ‘चिनकुंग’ यानी धातुओं का काम, (3) शिहकुंग

यानी पत्थर की इमारतों का काम, (4) ‘मुकुंग’ यानी बढ़ई का काम, (5) ‘शोउकुंग’ जानवरों का शास्त्र, (6) और ‘त्साओ-कुंग’ यानी वनस्पति शास्त्र । इनमें से एक-एक की कई-कई शाखें थीं शिष्टाचार, तीरंदाजी और गाड़ी चलाना इन तीनों की पांच-पांच शाखें थीं गाने बजाने की और लिखने की छः:- छः और गणित की नी शाखें थीं। राजनीति के सिद्धांतों, व्यावहारिक राजशासन और युद्धविदा, इन की वरसों तालीम
दी जाती थी इन सब पर दलीलों के साथ और सिलसिलेवार कायदे से लिखी हुई बड़ी-बड़ी किताबें थीं जिनमें हर मजमून का एक-एक पहलू अलग-अलग समझाया गया था। साईंस की सबसे ज्यादा असर रखने वाली ईजादाँ में से कम से कम चार ईजादों का श्रेय चीन को हासिल है-कम्पास, कागज, छपाई का काम और बारुद।
असल में यही चार चीजें साईंस के युग का पेशखेमा हैं। लैकिन यह वात भी ध्यान देने योग्य है कि चीनी लोग वारुद का इस्तेमाल खेल-तमाशों, आमोद-प्रमोद और आतिशवाज़ी के लिए करते थे, यूरोप की तरह दूसरों को मारने या किसी की
जान लेने के लिए नहीं। इसी से पता चलता है कि चीनी सभ्यता और यूरोप की सभ्यता के बुनियादी असूलों में बहुत बड़ा फ्रक है ।
चीनी सभ्यता की चार सबसे वड़ी विशेषताएं हैं :-
(1) चीनी सभ्यता रचनात्मक और मौलिक थी। वह विल्कुल चीन ही की जमीन की उपज थी। वह किसी से नक़ल की हुई या उधार ली हुई चीज न थी।
(2) चीनी सभ्यता का एक बहुत बड़ा गुण उसका स्थायित्व है मिस्र और सुमेर काल का ग्रास बन गये, लेकिन चीन अभी मौजूद है और बढ़ रहा है।
(3) चीनी सभ्यता बड़ी व्यापक है। चीनी भाषा और लिखावट, दोनों, सारे यूरोप से बड़े रकवे के लिये हमेशा एक ही रही हैं।
(4) अंत में चीनी सभ्यता मनुष्य मात्र का भला चाहने वाली और सबको फायदा पहुंचाने वाली है। बारुद का इस्तेमाल इसकी अच्छी मिसाल है। यह चीज चीन में सिर्फ, खेल-तमाशे और खुशी के अवसर पर इस्तेमाल की जाती थी, जो दूसरे देशों मैं मनुष्यों के नाश का सबसे जबरदस्त कारण बन गई। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि चीनी सभ्यता, सिवाय हिंदुस्तान की सभ्यता के, बाकी पुराने जमाने की या आजकल की सभ्यताओं से प्राचीन है। मिस्र और यूनान की सभ्यताएं इतनी देर तक न ठहर सकीं। यूनान और रोम की सभ्यताएं इतनी व्यापक नहीं थीं। यूरोप की आधुनिक सभ्यता पर राय जाहिर करने का अभी समय नहीं आया।

दुनिया में सबसे पुराना इतिहास
चीन की पौराणिक कथाएं तो बहुत ज्यादा दूर तक जाती हैं। उन कथाओं के अनुसार चीनियों का आदि पुरुष ‘पान-कु’ था जिसने इस विश्व की रचना की है-और जिसका सारी दुनिया पर राज था । उसके बाद अनेक सम्राटों और अनेक
युगों का जिक्र आता है। लेकिन चीन का विश्वसनीय इतिहास 2700 ई. पू. से यानी सम्राट हुआग-ति के समब से शुरू होता है। इससे पहले चीन में बहुत से अतग-अलग क़रबीले रहते थे जिनमें अक्सर लड़ाइयां होती रहती थी। सम्राट हुआंग-ति ने सारे चीन को मिलाकर एक बड़ा साम्राज्य क़ायम
किया। उसी समय से समाज और शासन दोनों की नई व्यवस्था क़ायम हुई और सभ्यता के हर पहलू में तरक्की होने लगी। हुआंग-ति को ही चीनी क़ौम का जन्मदाता माना जाता है। चीनी अपने को उसी का वंशज मानते हैं और उसकी तख्त-नशीनी के समय से अपने देश का इतिहास शुरू करते हैं। हुआंग-ति के पीछे एक दूसरे के बाद बहुत से सम्राट हुए जिनमें याओ नाम के एक सम्राट ने पूरे 100 वर्ष शासन किया उसके बाद के सम्राट शुन ने 48 वर्ष हुकूमत की। ये दोनों सम्राट याओ और शुन चीन में आदर्श शासक माने जाते
हैं। महात्मा कनफ़यूशियस और मेन्सियस दोनों इन्हें आदर्श शासक कहकर बयान करते हैं। उनका जमाना चीनी इतिहास में बड़े गौरव का जमाना था। उन दिनों हर सम्राट अपने मरने से काफी पहले खुद अपनी इच्छा से गद्दी छोड़कर दूसरे को अपनी जगह देकर राजकाज से बिल्कुल अलग हो जाया करता था। इसीलिए वह जमाना शान योग यानी अपनी इच्छा से पद त्याग करने का ज़माना’ कहलाता है जब कभी कोई सम्राट ऐसा न कर पाता थया तो उसके मरने के बाद लोग उसकी जगह दूसरा सम्राट चुन लेते थे।
सम्राट याओ और सम्राट शुन के जमाने में ‘यु’ नाम का एक बूढ़ा वरज़ीर था। चीन की नदियों- में उन दिनों बड़ी-बड़ी बाढ़ें आया करती थीं जिनसे रिआया के जानमाल की बड़ी हानि होती थी। ‘यू’ ने नौ बड़ी-बड़ी दरियाओं के दहानों को चौड़ा करके और बहुत सी नहरें काट कर इस तरह का इंतजाम कर दिया कि आइंदा के लिये।इन बाढ़ों से नुकसान होना बंद हो गया। सम्राट शुन के बाद लोगों ने यु को अपना
सम्राट चुना। आठ वरस वाद उसने सिंहासन छोड़कर अपने एक वजीर ‘पोयि’ को सम्राट बनाना चाहा। उस वक्त तक के सम्राट अपने सबसे योग्य मंत्री को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते थे। बाप की गद्दी बेटे को मिलने का उस वक्त तक चीन के सम्राटों में कोई रिवाज नहीं था। लेकिन अव चीन की प्रजा ने पोयि की जगह शुन के एक वेटे ‘चि’ को ज्यादा पंसद किया ‘चि’ ही शुन के बाद सम्राट हुआ और उसी समय से चीन में बाप की गद्दी वेटे को मिलने का रिवाज पड़ा। एक दूसरे के पीछे कई राजकुल सम्राट की गद्दी पर वैठे। इनमें सबसे ज्यादा देर तक यानी 1122 ई.पू. से 155 ई.पू. तक, 867 साल तक चोउ राजकुल का जमाना रहा। इन 867 वर्षों में इस कुल के 37 सम्राट चीन के सिंहासन पर वैठे।

यह सारा
ज़माना चीन के इतिहास में स्वर्ण-युग समझा जाता है। सभ्यता के हर पहलू से चीन ने उन दिनों बहुत तरक्की की बड़े बड़े संत, महात्मा और विद्वान हुए। महात्मा कन्फ्यूशियस और महात्मा लाओत्जे के अलावा मेन्सियस, मोतु, हसुनतु उस जमाने के प्रसिद्ध महापुरुष थे। हिंदुओं के दर्शन-शास्त्रों से मिलते जुलते उन दिनों चीन में दस ‘दर्शन लिखे गए। वह ज़माना विद्या और विचारों का ज़माना था। चीनी संस्कृति उन दिनों खूब फूली फली।
चीनी साम्राज्य उस समय नए सिरे से नी राज्यों में बांटा गया। हर राज्य में कई-कई रियासतें शामिल की गई, जिनमें कुछ बहुत छोटी थीं । हर रियासत एक राजा के सुपुर्द की गई और उसके कुल में पैतृक बना दी गई। उसके अलावा बहुत
सा इलाक़ा सीधा सम्राट के अधीन किया गया जो हुआंग चि’ कहलाता था। हर
राजा को अपने राज्य के इंतज़ाम की पूरी-पूरी रिपोर्ट सम्राट को भेजनी होती थी। हर तीन साल के बाद सम्राट की तरफ से एक अफसर रियासतों की जांच-पड़ताल, वहां की प्रजा की हालत का पता लगाने के लिये जाता था। इस तरह चीन की ये सब रियासतें मज़बूत शासन-सूत्र में बंधी रहती थीं चीन की सारी प्रजा की खुशहाली का खास ख्याल रखा जाता था और अन्यायी राजा की शिकायत करने और उसे हटाने का पूरा मौका दिया जाता था इन मायनों में चीन की रियासतें एक तरह की जनतंत्रात्मक रियासतें थीं।
उस ज़माने की दूसरी खास बात लगान की थी जिसे ‘चिंग-तिएन’ कहते हैं। सारी जमीन प्रजा की जमीन समझी जाती थी और सबमें बराबर-बराबर बांट दी गई थी। हर मुरब्या ‘लि’ के नौ दुकड़े किये गये और हर दुकडड़़े में मीन
पी इन नी सी पोडस जमीन में से 800 मीडस आठ कुटुम्बीं की उनके गुजारे के लिये हैं ही गई और बीच की सी मोडस जमीन सरकारी या पंचायती जगीनीं के तौर पर छोड़़ दी गई आस-पास की. किसानीं का फर्ज होता था कि वारी-वारी मे
उस सरकारी ज़मीन को जोतें, बोएं। सरकारी जमीन की पैदावार से सरकार का खाद खर्ष चलता था और बाकी जमीनों की पैदावार पर किसानी का पूरा अधिकार होत
था। सारे तेश की जगीन इसी तरह टुकड़ी मै बट दी गई यह एक तरह का साम्यवाद (कम्पूनिष्प) था। यह पद्धति सदियों तक अच तरह चलती रही। 20 ईसवी से लेकर 1911 ईसवी तक कई राजकुल चीन की गही पर बैठे जिनमें तांग कुल और सुंग कुल सबसे ज्यादा मशहूर हैं क्योंकि इनके जमाने की
चित्रकारी और चीनी मि्टी के बर्तन दुनिया में कला के सरबसेसुंदर नयूने गिने जाते हैं, जिनसे बढ़कर उस तरह की चीजें आज तक दुनिया के किसी दैश ने पैदा नहीं कीं। सन् 1911 ई. में चीन के अंदर राजकुलोंँ का जमाना हमेशा के लिये खल्म हो गया और शुद्ध जनतंत्र का जमाना शुरू हो गया। चीनी संस्कृति की एक झतक प्रोफेसर तानयुनशान लिखते हैं :- चीनी समाज तीन मुख्य भागों में बंटा हुआ था
(1) कुलों के अनुसार,
(४) र्थानों के अनुसार और
( 3 ) पेशों के अनुसार।
चीनी जनता अपने अपने कुलों के संस्थापकों की पूजा करती थी और इसीलिए उनमें कुल वंधुल वहुत गहरा होता था हर कुल अपने आप मैं समाज का एक ‘कुल मंदिर’ कहलाता था हर कुल में भी कई फ्रिरक्रे होते थे और हर फिरके का
अपना परिवार भवन होता था जो “परिवार-मंदिर’ कहलाता था आमतौर पर जिले के कैंदर में कुल- पदिर होता था और गांव-गांव में परिवार- मंदिर कुल का सबमें बृढ़ा आदमी ही कुलपति होता था और कुल-भवन के प्रबंध के लिये समस्त कुल वाले।मिलकर एक कमेटी चुन लेते थे कुलपिता के जन्म दिन पर और दूसरे त्यौहारों पर समस्त कुल वाले कुल मंदिर में इकट्ठा होते थे और कुलपिता की याद में उत्सव
मनाते थे। कुल से संबंध रखने वाले तमाम मामलों का वहां निपटारा होता था।।कुल के सदस्यों में जब आपस में कोई मुक़दमेवाज़ी होती थी तो उसका फैसला भी इसी अवसर पर होता था। जब कुल मंदिर में फैसला नहीं हो पाता था तभी सरकारी अदालतों में मुकदमे जाते थे हर कुल सावधानी के साथ अपना वंश परिचय सुरक्षित रखता था और कुल से संबंध रखने वाली खास-खास घटनाओं का क्रमबद्ध इतिहास
लिखा जाता था। कुल के हर सदस्य की जन्म और मृत्यु की तारीखें भी कुल-मंदिर के रजिस्टर में सावधानी के साथ दर्ज की जाती थीं।।चीन में लोग अपने खानदान और अपने गांव या शहर के प्रति भी सम्मान व भक्ति रखते हैं। उनकी यह भक्ति चीन के सामाजिक जीवन पर एक खास असर डालती है। गांव में “तु-ति मिआव” (स्थानीय मंदिर) ¨शेह-त्सांग” (गांव का अन्न भंडार), “शु-युआन” (स्थानीय आम सभा) आदि संस्थाएं होती थीं। शहरों में और खास कर ऐसे शहरों में जहां कल कारखाने हैं वहां की मुख्य संस्था “हुई-कुआन”
थी यह संस्था मध्यकालीन इंग्लैंड की ट्रेड गिल्ड से मिलती-जुलती थी। गांव के मंदिर में गांव वाले मिलकर पूजा करते थे और गांव के अन्न भंडार में गांव वाले मिलकर, अपनी खपत से बचा हुआ, अनाज भर देते थे जो अकाल के दिनों में काम आता था। आम सभा के सुपुर्द उस भवन का इतज़ाम होता था, जहां बड़े-बड़े सामाजिक जलसे और सभाएं होती थीं। गांव के आपसी झगड़ों का निपटारा इन्हीं आम सभाओं में होता था जिस तरह गांव की सभाएं होती थीं उसी तरह ज़िले के केंद्र में भी आम सभाओं का संगठन होता था जहां जिले भर के गांव के प्रतिनिधि समय-समय पर इकट्टा होते थे। ज़िले ही की तरह प्रांत में केंद्रीय सभाएं होती थीं जहां विविध ज़िलों के प्रतिनिधि इकट्ठा होकर प्रांतीय महत्व की बातों पर अपने फैसले करते थे। इन सभाओं के पास अपनी बड़ी-बड़ी जायदादें होती थीं। चीनी दस्तकारों और पेशेवरों का संगठन बहुत पुराना और अपने आप में परिपूर्ण था विविध उद्योग धंधों में लगे हुए लोगों और दस्तकारों की जमातों को “हांग” (वर्ग) कहते थे। एक पेशे के सब दस्तकारों को “तुंग-हांग” कहते थे। चीन में विविध धंधों की इस तरह, की तीन सौ साठ हांग थीं । हर हांग का केंद्र, जिले या प्रांत की राजधानी में होता था हर हांग के पास बहुत सा धन होता था, उसका अपना संगठन विधान होता था और उसकी चुनी हुई कार्यकारिणी समिति होती थी। हांग की जनरल कमेटी की साल में दो बैठकें होती थी-एक वसंत में और दुसरी पतझंड़ में। इन बैठकों में समस्त दस्तकार अपने-अपने व्यापार या धंधों की चर्चा करते थे और उसे फैलाने और बढ़ाने के उपायों पर सलाह मशविरा करते थे। हर।हांग का एक-एक इष्टदेव होता था जो उस धंधे का आविष्कारक समझा जाता था और साल में एक बार उसकी पूजा होती थी और उसकी मृर्ति के सामने भेटें चढ़ाई जाती थीं।
चीनी समाज की सबमें बड़ी विशेषता यह थी कि वहां जाति-पांति के झगड़़े नहीं थे। शुरू-शुरू में चीनी जनता चार भागों में बंटी हुई थी। (1) ‘शिह’ (विद्वान), (2) ‘नुंग’ (किसान),
(3) ‘कुंग’ (दस्तका का समाजी संगठन था। सरकार भी इनके साथ उचित व्यवहार करती थी।

किंतु एक गिरोह से दूसरे गिरोह में जाने की मनाही न थी और महज पैदाइश की वजह से कोई एक गिरोह का बंधेल न हो सकता था। चारों में से किस गिरोह में कोई व्यक्ति रहे यह उसकी अपनी रुचि और पेशे पर निर्भर था। चारों गिरोहों में आपस में खूब शादी व्याह भी होते थे विद्वान के गिरोह की समाज में सबसे ज्यादा इज्ज़त थी और हर जगह उनका आदर होता था। व्यापारी को समाज में सबमें निकृष्ट समझा और (4) ‘शांग’ (व्यापारी)। यही वहां जाता था। बावजूद उसके पैसे के लोग उससे इसलिये नफ़रत करते थे कि वह अपनी
मेहनत से कुछ भी पैदा नहीं करता था और समाज के ऊपर जॉक की तरह चिपटा रहता था।
चीनी समाज में परिवार का महत्वपूर्ण स्थान था। चीनी जनता माता-पिता के प्रति भक्ति, भाई-चारे और दोस्ती पर बहुत ज़ोर देती थी। सबकी यही ख्व़ाहिश होती थी कि उनका परिवार खूब बढ़े और वे सब साथ रहें। चीन में सबमें आदर्श परिवार उसे कहते थे कि जिसमें माता-पिता हों, दादा-दादी
हों, भाई और भाभियां और नाती पोते हों इस तरह के परिवार को ‘वु ताइ तुंग तांग’ कहते थे इसका अर्थ है, ऐसा परिवार जिसमें पांच पीढ़ियां साथ रह रही हों।।इस तरह के परिवार की समाज व सरकार दोनों इज्जत करते थे। दस आदमियों
का परिवार तो एक साधारण सी बात थी। बहुत से परिवार ऐसे थे जिनके सदस्यों की तादाद सौ से अधिक थी। कुछ बरस पहले चीन के समाचार पत्रों में ‘ति मिंग।युन नामक एक चीनी विद्वान की तस्वीर और जीवनी छपी थी। यह विद्वान 1660।ई. में पैदा हुआ और 258 वर्ष तक जिया, चौदह वार शादी की और 180 बच्चे।पैदा किये।
जिस तरह समाज का केंद्र है परिवार, उसी तरह परिवार का केंद्र है, पत्नी। उसी के हाथ में सारी शक्ति होती थी और वही घर पर हुकूमत करती थी चीनियों का बहुत पुराने जमाने से यह विश्वास रहा है कि मरदों को घर गृहस्थी के मामलों
में कोई दखल न देना चाहिये। यह काम पूरी तरह औरतों का है। सबसे पुराने चीनी धर्म ग्रंथ ‘ली-चिंग’ में लिखा है, “मर्दों को घर गृहस्थी के मामलों में कोई दखल न देना चाहिये और औरतों बाहर के मामलों में कोई दखल देना चाहिये।”
इस तरह पत्नी परिवार के अंदर सचमुच हुकूमत करती थी और घर के मामलों में उसका पूरा बोलबाला रहता था। पश्चिम की औरतें भले ही आजादी की डींग हांकें मगर अभी वहां की औरतों को उतने अधिकार नहीं मिले जितने चीन की औरतों।को हमेशा से प्राप्त थे। चीनी औरतें अपने पति पर पूरी तरह हुकूमत करती हैं।।एक पुरानी चीनी कहावत है “किसी सूरमा के लिये बीवी की बनिस्वत लाखों सैनिकों
से निपटना ज्यादा आसान है।”
चीनी इतिहास के पुराने उल्लेखों से पता चलता है कि चीन में किसी जमाने में स्त्रियां ही जायदाद की मालिक और वारिस होती थी उस जमाने में बेशक स्त्रियों का दरजा पुरुषों से ऊंचा रहा होगा। किंतु वह ज़माना बदल गया। दार्शनिकों और व्यवस्थापकों ने समय-समय पर क़ानून बनाकर स्त्रियों की शक्ति को कम करके समाज में उनके दरजे को घटा दिया।
चीनी धर्म ग्रंथ “लि-चि” (सामाजिक नियम) में स्त्रियों के तीन फ़र्ज बताये गये हैं-इस आदेश को चीनी भाषा में “सन-सुंग” कहते हैं। स्त्रियों में चार तरह के गुण होने चाहियें इन गुणों को ‘सुतेह’ कहते हैं। उसके तीन कर्तव्य हैं- (1) बचपन में वह पिता का कहना माने। (2) शादी के बाद पति का कहना माने
और (3) विघवा होने पर लड़के का कहना माने । उसके चार गुण हैं-(1) सतीत्व और धार्मिकता, (2) प्रेम और मिठास से बात करना (3) सदाचरण और नम्रता और (4) घर के काम काज में पटुता यानी खाना पकाना, कपड़ा बुनना, सीना पिरोना और गृहस्थी संभालने में निपुणता ।
बचपन से ही चीनी स्त्रियां कठोर अनुशासन के साथ शिक्षा देकर पाली पोसी जाती थीं। इसीलिये बड़े होने पर वे सदाचार और नम्रता की मूर्ति होती थीं चीनी समाज में ‘लिआंगचि’ (अच्छी पत्नी) और ‘हिएन-सु’ (दयालु मां) आदर्श स्त्री समझी जाती थी।
चीन का सारा सामाजिक ढांचा एक नैतिक ढांचा है और सामाजिक संबंध एक प्रकार का नैतिक संबंध है। छोटे-बड़े, करीब के या दूर के, सब रिश्तेदारों के बीच में दर्जे बने हुए हैं। उदाहरण के तौर पर बड़े भाई को ‘हिम-उंग’ और बड़ी
बहन को ‘रजु’ कहते हैं । छोटे भाई को ‘ति’ और छोटी बहन को ‘मे’ कहते हैं। ताया को ‘पो’ और चाचा को ‘शु’ कहते हैं। बुआ को ‘कु’ मामा को ‘चिन’ और मासी को ‘यि’ कहते हैं । ताई को ‘पो- मु’, चाची को ‘शु-मु’, फूफा को ‘कु-फु’ मामी।को ‘चिन-फु’, और मौसा को ‘यि-फु’ कहते हैं। चचेरे भाइयों को ‘तांग-हिस उंग ति’ और चरचेरी बहनों को ‘तांग-रजु-मे’ कहते हैं।
चीनी समाज में शुरू-शुरू में तीन तरह के बंधन थे जो ‘सन-कांग’ कहलाते थे। रिश्तों में छः दर्जे धे जो ‘वु-लुन’ कहलाते थे और नौ पीढ़ियों के रिश्तेदारों का हिसाब रहता था जिसे ‘चिउ-त्सु’ कहा जाता था । तीन तरह के संबंध थे।, (1)।शासक।और प्रजा का संबंध, (2) मां-बाप और संतान का संबंध, (3) पति और पल्नी का संबंध। छः दर्जे हैं- (1) पिता और पिता के छोटे बड़े भाई, (2) भाई और बहनें,।( 3 ) कुल, (4) मां और मां के भाई, (5) गुरु और ( 6 ) मित्र । पांच रिश्तेदारियां हैं-।( 1) मां- बाप और औलाद, (2) शासक और प्रजा, ( 3 ) पति और पत्नी, (4) भाई।और बहन और (5) मित्र। नौ पीढ़ियों में चार पीढ़ियां ऊपर की यानी माता पिता,
दादा-दादी, परदादा परदादी और लकड़दादा-लकड़दादी और चार पीढ़ियां नीचे की यानी बेटे-बेटी, नाती-पोते, परनाती-परपोते और परनाती परपोतों की औलाद इनके अतिरिक्त।तीन तरह के आम सामाजिक संबंध हैं-(1) खानदान के, (2) रिश्तेदारों के और।(3) दोस्तों के ।
चूंकि चीनी समाज नैतिक बुनियाद पर कायम था इसीलिये वह सदाचरण पर बहुत जोर देता था, क्योंकि सदाचरण के बगैर नैतिकता रह ही नहीं सकती और न नैतिकता के बगैर सदाचरण। चीनी संतों ने अनादिकाल से नैतिकता और सदाचरण के बहुत से नियम बना दिये हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी पांच नैतिक नियम।हैं जो ‘यु-चांग’ कहलाते हैं। इनमें (1) ‘जेन’ यानी परोपकार (2) ‘यि’ यानी न्याय।(s) ‘लि’ व्यवहार, (4) ‘चिह’ यानी बुद्धिमानी और (5) ‘हिसन’ यानी विश्वासपात्रता। चार तरह के आवश्यक कर्तव्य हर एक को करना लाज़िमी थे जो ‘रजुहिएंग’ कहलाते।हैं। ये हैं-(1) ‘हिस आब’ यानी माता पिता की भक्ति (2) ‘ति’ ‘भाइयों से स्नेह,।(৪) ‘चुंग’ यानी देशभक्ति, (4) ‘हिसंग’ यानी विश्वासपात्रता। समझा जाता है कि समाज चार स्तंभों पर क़ायम था। (1) ‘लि’ यानी व्यवहार, (2) ‘वि’ न्याय, (3)।’स्यु’ ईमानदारी और (4) ‘चिह’ यानी लज्जा की भावना। इनके अतिरिक्त और वहुत से नैतिक नियम हैं । चीन को चीनी और दूसरे विदेशी भी ‘संस्कारों और उत्सवों का देश’ कहते
हैं। दुनिया में और किसी देश में इतने उत्सव और संस्कार नहीं होते। यहां तीन।सौ ‘विधि संस्कार’ और तीन हज़ार रीति-रिवाज माने जाते हैं। इनकी वजह से साधारण जनता के लिये परेशानी और मुसीबत बेहद बढ़ जाती है । शादी चीनी ज़़िंदगी की सबसे महत्वपूर्ण घटना है और इसीलिये उसकी संस्कार विधि बहुत लंबी होती है।
सगाई और शादी के बीच में छः संस्कार- विधियां होती हैं, वे हैं-(1)-“ना-त्साह” यानी वरदीक्षा (2 ) “वेन-मिंग” यानी लड़की का नाम पूछना (चीन में उस समय तक लड़की का नाम नहीं पूछ सकते जब तक शादी पक्की तरह बंध न जाए), (3) *ना-चि” यानी सगाई की रस्म (तिलक), (4) “चिंग चि” यानी शादी की तारीखें मुकर्रर होना, (5) “ना-चिंग” यानी कपड़े, बर्तन, गहने आदि की दहेज की रस्म का अदा किया जाना और (6) “चिन-थिंग” यानी शादी की तारीख पर वर का वधू के यहां जाकर शादी के बाद उसे बिदा कर के अपने घर लाना। शादी के दिन वर और वधू की बड़ी खातिरदारी की जाती है। वधू जब अपनी ससुराल आती है तो उसे फूलों की
पालकी में बैठाकर लाते हैं। इस पालकी को चार या आठ कहार उठाते हैं और आगे-आगे जुलूस गाजे-बाजों के साथ चलता है। जब बारात दुल्हन को लेकर वापस आती है तो सबसे पहले धरती और आसमान की पूजा की जाती है। फिर कुल-देवों और इष्ट-देवों की पूजा होती है। इसके बाद वर-वधू आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे को प्रणाम करते हैं। इसके बाद दोनों को सुहाग-भवन में ले जाते हैं। वहां दो लाल
मोमबत्तियां जला दी जाती हैं। इसके बाद दोनों को सुहाग के पलंग पर बैठाया जाता है। फिर दोनों को एक ही प्याले से ‘मए-उल्फत’ पीनी पड़ती है। फिर तमाम यर वाले और रिश्तेदार मुंह देखकर दोनों को आशीर्वाद देते हैं। बुजुर्गों के बाद छोटों की बारी आती है और वे तरह-तरह का मज़ाक करके वर-वधू को परेशान कर देते हैं। शर्म के मारे वर का मुंह लाल हो जाता है और वधू लज्जा से गड़ जाती है। दूसरे दिन सुबह वर-वधू का मां-बाप, भाई-बहन, नाते-गोत्र वाले और दोस्तों से परिचय दिन खूब बड़ी दावतें देनी होती हैं। जब वधू ससुराल जाती है तो अपने पति के घर में वह एक महीने तक बिल्कुल मेहमान की तरह रहती है, रोज श्रंगार करना और रिश्तेदारों और दोस्तों के यहां दावत उड़ाना। एक माह के बाद तीन दिन के लिये वधू अपने मायके वापस आती है। फिर लौटकर ससुराल में वह घर-गृहस्थी के काम में जुट जाती है और आने वाले मातृत्व की तैयारी करती है। पुराने जमाने में शादियां माता-पिता ही तय करते थे। लड़के-लड़कियों से कोई सलाह न ली जाती।थी। मगर आजकल लड़के-लड़कियां खुद अपने लिये साथी चुनकर शादी करना पसंद करते हैं। विवाह की रस्म भी बहुत बदल गई है । अरभी पिछले दिनों शंबाई और।दूसरे बड़े शहरों में ‘त्यो-तुआन चेह-हुएन’ नामक शादी की रीति चली। इसके अनुसार।एक साथ और एक जगह बहुत सी शादियां हो जाती हैं। इसका मतलब यह है कि शादी की रस्म में क्रांतिकारी परिवर्तन हो गया है ।
चीन में मृतक का क्रिया कर्म भी एक महत्वपूर्ण संस्कार है। चीनी रिवाज के अनुसार शादी माता-पिता का बच्चों के प्रति अपने कर्तव्य को अदा करना है और मृतक कर्म बच्चों का मां-बाप की तरफ अपना फ़र्ज अदा करना है। इसलिये।जब मां बाप की मृत्यु होती है तो बच्चों के ऊपर ज़बरदस्त जिम्मेवारी आ जाती के बाद पुराने रिवाज के अनुसार पूरे सौ दिन तक हजामत बनवाना, शराब मृत्यु पीना, मांस खाना और यात्रा करना मना है। कोरा सफेद कपड़ा पहनना, एक खास
वियोग की टोपी पहनना और शव के पास सिकुड़े हुए बैठे रहना-यही उनका काम है। उसके बाद वे अपने तमाम रिश्तेदारों और दोस्तों के पास शोक पत्र भेजते हैं।
जिस रिश्तेदार या मित्र पर जाकर फूल चढ़ाये और शोक-संतप्त परिवार के साथ समवेदना प्रकट करे।
यह शोक पत्र मिलता है, उसका फर्ज है कि वह अर्थी चीनी प्रथा के अनुसार शव को ज़मीन में दफ़नाया जाता है। मौत के बाद फीरन बहुत नजदीकी रिश्तेदार शव को नहलाते हैं और खास तीर पर वनाया हुआ रेशमी कफन उसे पहनाते हैं। उसके बाद शव को एक सुंदर और क़ीमती शवपेटी (ताबूत) में बंद करके घर के बड़े कमरे में रख देते हैं, ताकि रिश्तेदार और दोस्त आकर संवेदना प्रकट कर सकें मीत के तीसरे दिन तावूत (शवपेटी) को सील कर दिया जाता है और लकड़ी की तख्ती में मृतक का नाम, उसके जन्म और मृत्यु की तारीख लिख दी जाती है। जब उन्चास दिन बीत जाते हैं तब दफनाने के लिए एक अच्छी जगह और शुभ मुहूर्त तय किया जाता है। शव जिस दिन दफन किया जाता है, उस दिन का संस्कार बहुत महत्वपूर्ण होता है। ताबूत को खूब सजाया जाता है और आठ से चौसठ आदमी तक उसे उठाते हैं। वेटे और पोते लकड़ी का सहारा लेकर आगे-आगे चलते हैं। दूसरे रिश्तेदार और मित्र ताबूत के अगल-बगल चलते हैं। स्त्रियां गाड़ियों पर ताबूत के पीछे चलती हैं बौद्ध भिक्षु और ‘ताओ’ पुरोहित और भजन वाले गाजे बाजों के साथ आगे और पीछे रहते हैं। मृतक के इस जुलूस की शान और बड़प्पन शादियों के जुलूसों से कहीं ज्यादा होती है। चीन में खेल-तमाशों और त्योहारों का वहुत महत्व है। चीनी किसान अपने फुरसत के मौकों पर तरह-तरह के खेल-तमाशे करते हैं। उनका एक खेल है ‘ता-तुंग’। इसमें दीवों का प्रदर्शन होता है। दूसरा खेल है ‘दु-शिह’ । इसमें शेर का प्रदर्शन किया जाता है। तीसरा खेल है ‘बु-लुंग’। इसमें एक दानव के कारनामे हैं और भी बहुत से नाटक और तमाशे होते हैं। दीवों के खेल में तमाम गांव वाले जलते हुए दीवे लेकर इकट्ठा होते हैं और जुलूस बनाकर गाजे-बाजों के साथ गांव-गांव जाते हैं। सिंह और दानव के तमाशों में उछल-कूद, तलवार चलाना और दूसरी शारीरिक कसरतें दिखाई जाती हैं। इस तरह के खेल पंद्रह दिन से लेकर महीने-भर तक चलते हैं।
पारी-पारी से सभी गाँवों में ये खेल किये जाते हैं। एक गांव की बारी अक्सर कई बरसों में आती है। इन मेलों, तमाशों के साथ-साथ गांव की बनी चीज़ों की नुमाइश भी होती है, जहां कारीगरी और सुंदरता की वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा होती है। बाजार भी लगते हैं, जहां हिंदुस्तानी मेलों की तरह चीज़ों की खरीद-फ़रोख्त होती है।
हिंदुस्तानियों की तरह चीनी जनता भी तीज-त्याहारों को बहुत महत्व देती है। उनका सबसे बड़ा त्योहार नौरोज़ है। चीनी पंचांग के अनुसार पहले महीने में पहली झोपड़े को सजाया जाता है। दरवाजे खिड़कियों पर लाल कागज की बन्दनबार और आकाश-दीप लटकाये जाते हैं। घरों में शुभ शब्द और कहावतें लिखी जाती हैं। तरह-तरह के दिल-बहलाव के तमाशे होते हैं और घर-घर में दावतें होती हैं। नी रोज के बाद पांचवें महीने के पांचवें दिन ‘तुआन-बु’ और आठवें महीने के पंद्रहवें दिन ‘मुंग-चिन’ नामक त्योहार मनाये जाते हैं। दो त्योहार अपने पूर्वजों और वुजुर्गो की याद में मनाये जाते हैं। इन तिथियों में लोग अपने-अपने बुजुर्गों के मज़ारों पर
जाते हैं और उनके नाम पर भेंट चढ़ाते हैं। सातवें महीने का सातवां दिन कुमारी कन्याओं के लिये बड़ा शुभ समझा जाता है। नौवें महीने के नीवें दिन विद्वान और कवि पहाड़ों की चोटी पर चढ़ते हैं। वहीं भोजन करते हैं और गा-बजाकर दिन विताते
हैं। चीनी और दूसरे मुल्कों के त्योहार धार्मिक होते हैं, चीन के त्योहार ऋतुओं के बदलने पर और दुनियावी बातों के सिलसिले में मनाये जाते हैं। जन-क्रांति के बाद सरकारी तौर पर चीन का पुराना पंचांग छोड़कर सन् ईसवी की तारीखें ही मानी जाने लगी हैं और त्योहारों की सूची में बहुत से राष्ट्रीय उत्सव भी शामिल कर लिये गये हैं। किंतु जनता अब तक पुराने पंचांग और पुराने त्योहारों से ही चिपटी हुई है इसका मतलब यह नहीं कि चीनी-जनता कट्टर है, बल्कि चीनी पंचांग ईसवी सन्।से कहीं ज्यादा उनके लिये मोजू है और पुराने त्योहारों का मौसमों के साथ गहरा संबंध है।
चीनी सभ्यता दुनिया की अति प्राचीन सभ्यता है। चीनी जनता अपनी सभ्यता और संस्कृति की बेहद क़दर और इज्ज़त करती है। चीन ने हमेशा अपने आसपास की क़ौमों में अपनी संस्कृति का प्रचार किया है। भारतीय बौद्धकाल को छोड़कर यह क्रम हज़ारों बरस तक चलता रहा है। सिर्फ उन्नीसवीं सदी से जबकि चीन पश्चिमी सभ्यता के संसर्ग में आया, तब से चीन की संस्कृति आधुनिक और पुरातन का समन्वय बन गई है।

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