ईमली

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इमली


प्रजाति : ईमली ।
वैज्ञानिक नाम : त्तमरिन्दुस इंदिका लिन. ।
अंग्रेजी नाम : टेमेरिंडस ट्री ।
हिदीनाम : इमली ।
क्षेत्रीयनाम : इमली ।
ट्रेडनाम : इमली ।
परिवार : केसलपिनिआसी ।
विवरण-इमली का वृक्ष खूबसूरत, मध्यम से बहे आकार के रूप में लगभग संपूर्ण भारत में पाया जाता है । कम अवस्था में वृक्ष का त्तना सीधा व नियमित; पत्ते में छोटे पर्णक व स्वाद में खटूटे; पीलेमुँर-लाल रंग के षुष्पगुच्छ; फल पॉड रूप में फूला हुआ, अर्द्ध चंद्राकार, गहरे “फूं रंग में पाया जाता है ।
संग्रहण अवधि-अक्तूबर से दिसंबर तक इमली के पॉड संगृहीत किए जाते हैं । तेरह-चौदह वर्ष की आयु के वृक्ष से औसतन २ विवंटल इमली फल प्राप्त होते हैं ।


संग्रहण विधि
बांस से या लाठी द्वारा हिलाकर इमली फल `एकत्र किए जाते हैं । पका हुआ फल, जिसका बाहरी आवरण सूखा हुआ तथा गूदे से अलग किया जा सके, ही तोडा जाता है । लाठी मारकर तोड़ने से वृक्ष क्रो नुकसान होने के साथ कच्चे फल भी गिरेंगे । एक पूर्ण पक्व वृक्ष (चौदह से साठ वर्ष तक) लगभग १८० से २५ ० विध्या. तक फल दे देता है । इस प्रकार प्राप्त बाहरी आवरण रहित फ्लॉ को लकडी के हधौडों से साफ पबके फ़र्श व पत्थर पर पीटकर बीज क्रो अलग किया जाता है तथा गूदे क्रो १ ० प्रतिशत नमक के. साथ मिलाकर अंदर की हवा निकाल दी जाती है । ईट या गोले की शक्ल में खाली बोरों, पॉम चटाई के आवरण में लपेटका मैक किया जाता है । भंडारणड-फल गूदे को भंडारण करते हुए सीधे बोरे में पैक करना उचित नहीं होगा । गूदे को नारियल पॉम चटाई में लपेटकर बोरे में पैक किया जाता है । नमी रहित, शुष्क वातावरण तथा हवादार, स्वच्छ स्थल पर बोरों को भंडारित किया जाता है । इसके अतिरिक्त बीज सहित साफ़ इमली को भी इसी प्रकार जूट/पटसन के खाली बोरों में भरकर भंडारण किया जाता है । यदि नमक मिश्रण न प्रयोग में लाया जाए तो कुछ समय पश्चात् स्वाद में अंतर देखा गया है । प्रजनन-इमली का बीज, बर्डिंग व कटिंग द्वारा प्रजनन प्रसार किया जाता है । स्थल की मिटूटी हल चलाकर नरम की जाती है तथा हल चलाने से उठी मेडों पर पंक्तियों में बीज डालकर हलका सा दबाव डालकर मिदृटी में दबा दिया जाता है । पाँच रने आठ दिन मेँ बीज अंकुरित हो जाते हैं अथवा रेजड नर्सरी जेड्स में अप्रेल माह में बीज हलकी रेतीली मिटूटी व गोबर खाद में बो दिए जाते हैँ । जुलाई से अगस्त में १.५ ४ १ .५ ४ १ .५ फीट आकार के गइढे ३ ४ ३ मी. के अंतराल पर ट्रांसप्लांट कर दिए जाते हैं । नियमित निराई-गुड़ाई तथा उर्वरक डालने से पहले मौसम में ही लगभग २ फाँट ऊँचाई तक पहुँच जाते हैँ । उपयोगिता-मूल गूदे को चटनी, सॉस, जेली, खमीर, बेकरी आइटम तथा पाक कला में प्रयोग किया जाता है । औद्योगिक रूप मेँ टार्टरिक एसिड, पेबिटन, डेनिंग, अल्कीहल ब औषधि निर्माण में प्रचुरता से प्रयोग किया जाता है । फल का बीज, स्टार्च व खाद्य रूप में फिनिशिंग, साइजिंग व औषधियों में भी प्रयोग किया जाता है । पत्ते व फूल अचार, सब्जी व खाद्य रूप में प्रयोग किए जाते हैँ । चीज मींगी का उपयोग म्यूसिलेज व पॉलीरपेवराइड रूप में भी किया जाता है । फल गूदे को अंतरराष्टीय स्तर पर निर्यात भी किया जाता है ।
औषधीय उपयोग
क. अर्श में अनार का रस, दही, धनिया तथा सोंठ के साथ पत्तों का साग बनाकर खाएँ।
ख. अरोचक (अरुचि) में पकी इमली के पानी में गुड, इलायची, दालचीनी एवं मिर्च मिलाकर कवल धारण करें ।
ग. कास में १ ४ से १ ८ मिली. पत्रों का ववाथ ५ ग्राम घी में भुनी हींग एवं २ ग्राम सेंधा नमक के साथ दिन में दो चार दें ।
घ. चर्म रोग (दबु) में पत्रों के रस का लेप करें ।
च. बाल रोग (छर्दि) में बीजों एवं धान के लावों का चूर्ण सेंधा नमक के साथ मिलाकर १ से २ ग्राम की मात्रा में दिन में तीन बार दें ।
छ मसूरिका में पत्रों का ३ से ६ ग्राम चूर्ण ठंडे पानी के साथ दिन में तीन जार लें ।
ज़. बात व्याधि में पत्रों को ताहो के साथ पीसकर गरम करके वेदना युवत्त स्थान पर बाँधे ।
झ. शोथ में पत्रों के कल्क से शोथ स्थान पर ‘वार-बार सेंक कों ।
त. स्वरभेद में १ ग्राम पुराने फलों के चूर्ण को शहद के साथ दिन में तीन जार लें ।
मुख्य क्रेता/जाजार : ईसके मुख्य बाजार दक्षिण भारत, बैंगलोर, मुंबई, बिहार, उडीसा, आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश हैं । मुख्य सावधानियाँ-इमली फल को पैक करते समय प्रथमत: पॉम की चटाई में ही लपेटकर, बोरों में भरकर नमी रहित वातावरण में भंडारित कों । लंबे समय तक भंडारण १ ० प्रतिशत नमक के साथ मिलाकर ही कों ।

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