अवाह देवी मन्दिर

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अवाह देवी मन्दिर


1250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अत्राह देवी मन्दिर जिला हमीरपुर कं व्रड़सर उपमण्डल के अन्तर्गत है । प्रशासनिक सीमाएं किसी प्रकार भी श्रद्धालुओं की मानसिकता क्रो प्रभावित नहीँ करती । मन्दिर तक पहुंचने क लिए सौं सीढियों का फासला तय करना होता है । सीढियों की चढाई शुरू करने से पूर्व श्रद्धालु मंडी जिला मेँ होता हे तो सीढियों के बाद हमीरपुर में-उसे तो कंवल मन्दिर से सरोकार हे, सीमाओँ से नहीं ।


आज मंडी तथा हमीरपुर (कांगड़ा) हिमाचल प्रदेश के क्षेत्र हैँ, मरन्तु जब मन्दिर अस्तित्व में आया तो स्थिति थिन्न थी । कग्रेगड़ा उस समय पंजाब प्रान्त का एक जिला था और हमीरपुर उसका उपमंडल । मंडी में राजा का शासन था । अबाह देवी ऊँची पहाडी पर स्थित हे…उत्तर में संघोल तक बचकर खहूड मंडी-कांगड़ा
की प्राकृतिक सीमा…दक्षिण में अत्राह देवी से कलाहू गांव तक कोई प्राकृतिक सीमा नहीँ । सीमा तय करने सम्बन्धी एक जनश्रुति है कि मंडी नरेश भवानी सेन कलाहू गांव से अत्राह देवी तक घुड़सचारी कर आए । जिधर जिधर से घोड़ा निकला वहीँ मंडी क्रांगड़ा की सीमा बन गई । यह सीमा नितान्त कृत्रिम थी । सन् 1966 में कांगड़ा हिमाचल प्रदेश कर भाग बना, तो यह कृत्रिम बन्धन टूट गया । फ्लो चोटी पर स्थित मन्दिर का परिवेश अत्यन्त रम्य हे…कग्रेगड़ा घाटी, धीलाधार पर्वतमाला, मंडी क्री धाराएं, बिलासपुर तथा ऊना जिला-सभी तो, उच्व शिखर से, नजर में समा जाते हैं । मन्दिर से पूर्व में हे मंडी जिला और तीनों दिशाओं मेँ हमीरपुर । इस मन्दिर का सम्बन्थ पाण्डवों से भी जोडा जाता है । एक जनश्रुति क अनुसार गांव झाडियार (सरकर घाट) वो राजपूत परिवार के मुखिया क्रो स्वप्न आया कि गांव संगरोह (हमीरपुर) मेँ मां भवानी की पिण्डी है, जिस पर मन्दिर निर्मित किया जाए । संगरोह गांव के एक किसान को खेत में पिण्डी मिली । प्रयास करने पर भी वह उसे उठा न सका । विचित्र संयोग था कि उसने पूर्व दिशा मेँ (वर्त्तमान मन्दिर स्थल) चलने का संकल्प किया तो पिंडी सहज बन गई । पिमडी की यहीँ स्थापना कर दी गई । “अवाह देवी’ नामकरण शायद यहाँ हर समय तीव्र गति से चलने वाली हवा कै कारण हुआ हो… ‘हौआ’ स्थानीय बोली है । निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मन्दिर का निर्माण कब हुआ ।
मान्यता यह है कि यह मन्दिर 150 200 वर्ष ही पुराना है । मन्दिर कं मूल भवन के निर्माण का श्रेय मंडी नरेश भवानी सेन को प्राप्त है । बाबा श्रवणनाथ अंबाला निवासी में भवन का विस्तार ही नहीं किया, अपितु आधुनिक रूप भी दिया ; मन्दिर मेँ मुख्य पिण्डी के साथन्ताथ प्राचीन मूर्तियां हैं, तो एक बड़ा शिवलिंग भी स्थापित हे ।
क्षेत्र के लोगों में देवी के प्रति विशेष श्रद्धा है । घर में शादी८व्याह हो या उत्सव, किसी को नौकरी मिली हो या तरक्सी-प्रथम समर्पण देबी मां कं चरणों में होता हे । हर मंगलवार और रविवार को यहां एक मेले का-सा दृश्य होता है । ढोल-बाजे कॅ स्वर, माता की भेंटें…वातावरण क्रो सात्विक बना देते हैं । चारों तरफ से स्वर उठता है “मंडीया दी जातरा है, कांगड्रीए भी आए 3′ यह परस्पर सौहार्द का स्वर है । हिमाचल प्रदेश के वर्तमान मुख्य मंत्री प्रो० प्रेमकुमार धूमल धार्मिक विचारों कँ एक चिन्तनंशील एवं कर्मठ व्यवित्त हैँ । उनका विकास अभियान यहां भी रंग लाएगा, ऐसा चिन्तन है ।
कामना देवी मन्दिर ८ हर समय खुले द्धार
शिमला से पांच कि०मी० क्री दूरी पर, देवदार वृक्षों से धिरी पर्वत की चोटी पर मां कामना देबी का मन्दिर है, जिसकी विशिष्टता यह हे कि इसके द्धार कभी भी बंद नहीं किए जाते । जो श्रद्धालु भी परिश्रम साध्य यात्रा कर यहां पहुंचता है उसे मां काली का आशीर्वाद प्राप्त होता है । मन्दिर का निर्माता कौन था, निधिचत्त नहीं, लोक विश्वास हे कि राजा जुगा ने मन्दिर का निर्माण करवाया ओर वह हर वर्ष कई बार पूजा कं लिए यहां आता था । मन्दिर का पर्यटन की दृष्टि से भी महत्त्व है ।

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